मुस्लिमों को कूपमंडूक बनाए रखने की राजनीति: योगेंद्र योगी

By Team Live Bihar 72 Views
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Yogendra Yogi

गैरभाजपा राजनीतिक दलों में विशेषकर कांग्रेस ने मुस्लिमों के वोट पाने के लिए उनके अधिकारों को लेकर कभी भी पहल नहीं की। यही वजह रही कि देश का मुस्लिम वर्ग विकास की मुख्य धारा में शामिल होने से पिछड़ गया। इतना ही नहीं गैरभाजपा दलों ने जब कभी मुसलमानों की भलाई का मौका आया तब नजरें चुरा ली बल्कि सत्ता में आने पर पुरानी स्थिति बहाल करने तक का वादा किया। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। मुस्लिम महिला को पति से गुजारा भत्ता देने की मांग की याचिका थी। कोर्ट ने कहा सभी महिलाएं सीआरपीसी की धारा 125 की मदद ले सकती हैं। यह कानून सभी धर्म की महिलाओं पर लागू होता है। गुजारे भत्ते के लिए अपने पति के खिलाफ याचिका दायर कर सकती है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन गॉर्ज मसीह ने फैसला सुनाया।

इस फैसले को गैरभाजपा दल गले नहीं उतार पा रहे हैं। इसी तरह तीन तलाक के फैसले को लेकर कांग्रेस सहित दूसरों दलों ने विरोध किया था। कांग्रेस ने सत्ता में आने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए तीन तलाक के फैसले को पलट कर वापस तीन तलाक लागू करने का वादा किया था। इससे पहले शाह बानो पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने कानून में संशोधन करके बदल दिया था। कांग्रेस ने यह सब किया वोट बैंक की खातिर, किन्तु वह भी बच नहीं सका। दूसरे दल मुसलमानों की भलाई की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में ज्यादा आगे निकल गए। गैर कांग्रेस दलों में प्रमुख रूप से पश्चिमी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम वोटों की खातिर आतंकवाद के आरोपियों से समझौता तक करने में गुरेज नहीं किया।

शाह बानो केस में राजीव गांधी की सरकार ने वोट बैंक की खातिर कोर्ट का फैसला बदल दिया था। शाह बानो ने 1978 में इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अदालत से गुजारिश की कि उनके पति को उन्हें गुजारा भत्ता देने के लिए निर्देश दिया जाए। साल 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद अब्दुल को अपनी तलाकशुदा बीवी को 20,000 रुपए गुजारा भत्ता देने का कहा गया था। समद ने अपनी बीवी को तीन तलाक दिया था। इसके जवाब में तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 लागू कर दिया। इस अधिनियम ने तलाक के बाद केवल 90 दिनों तक मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं को अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने के अधिकार को प्रतिबंधित कर दिया। इसी तरह मुस्लिमों की आधी आबादी के पक्ष में जब तीन तलाक को निरस्त सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किया गया तब भी गैरभाजपा दलों ने काफी हायतौबा मचाई थी। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने 22 अगस्त 2017 को अपने फैसले में ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। कोर्ट ने 1400 साल पुरानी प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था और सरकार से कानून बनाने के लिए कहा था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने कानून बनाते हुए एकसाथ तीन बार तलाक बोलकर या लिखकर निकाह खत्म करने को अपराध की श्रेणी में शामिल कर लिया। इस अपराध के लिए अधिकतम तीन साल कैद की सजा का प्रावधान भी है।

तीन तलाक के मुद्दे पर गैरभाजपा दलों का असली चेहरा तब सामने आया जब संसद में इसके मामले में कानून पास करने से पहले वोटिंग हुई। गैरभाजपा दल ट्रिपल तलाक के खिलाफ थे, लेकिन राज्यसभा से वोटिंग के पहले भाग गए। इनमें बसपा के 4, सपा के सात, एनसीपी के 2, पीडीपी के 2, कांग्रेस के 5, टीएमसी, वामपंथियों पार्टियों, आरजेडी, डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस के एक-एक सांसद अनुपस्थित रहे। बिल को पास कराने के लिए एनडीए को 121 सदस्यों का समर्थन चाहिए था, लेकिन सांसदों की बड़ी संख्या में अनुपस्थिति की वजह से सदन में बीजेपी की स्थिति मजबूत हो गई और वह बिल पास कराने में सफल रही। विपक्ष के भागने की वजह यह रही कि भाजपा इसे मुद्द बना कर मुस्लिम महिलाओं से उनके खिलाफ धरना-प्रदर्शन नहीं करवा दे।

बिल पर बहस के दौरान वाईएसआर कांग्रेस के विजय साई ने कहा कि बिल का मैं 6 कारणों से विरोध करता हूं। लेकिन वोटिंग के दौरान विजय साई सदन में अनुपस्थित थे। बसपा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा का कहना था कि हमारी पार्टी इस बिल के खिलाफ है और इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे नकार दिया है और आप फिर से इसे अस्तित्व में लाना चाहते हैं। इस बिल से महिलाएं सबसे ज्यादा प्रताडि़त होने वाली हैं क्योंकि पुरुष के जेल जाने के बाद महिलाएं भी कहीं की नहीं रह जाएंगी। सरकार ने बच्चों की देखरेख करेगी और न महिलाओं को गुजारा भत्ता देगी, ऐसे में उनका जीवन कैसे चलेगा। तीन तलाक पर इस तरह मुखर होने के बावजूद बसपा का कोई सांसद सदन में उपस्थित नहीं था।

एनसीपी सांसद माजिद मेमन ने भी बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि कहा कि आप किसी को बगैर अपराध के 3 साल की सजा देने जा रहे हैं, तलाक कहना कोई अपराध नहीं है। जेल में जाने के बाद भी शादी खत्म नहीं होगी और महिला को गुजारा भत्ता के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा। जेल में रह रहा पति कैसे पत्नी को भत्ता दे पाएगा, ऐसे में कानून फेल हो गया। यह बिल पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है। मगर जब बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने के लिए सदन में वोटिंग हो रही थी, उस दौरान एनसीपी प्रमुख शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल उपस्थित नहीं थे। तीन तलाक बिल का विरोध करने वाले एनडीए के सहयोगी दल तो वॉकआउट कर गए जिनमें अन्नाद्रमुक, जेडीयू शामिल हैं। गैर-एनडीए और गैर-यूपीए टीआरएस सदन में गैर मौजूद रही।

कांग्रेस के अल्पसंख्यक महाधिवेशन में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने कहा था कि अगर हमारी सरकार आई, तो नरेंद्र मोदी सरकार के लाए ट्रिपल तलाक कानून को खत्म कर देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ये कानून मुस्लिम पुरुषों को जेल में भेजने की एक साजिश है। इस सम्मेलन में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी समेत अन्य कार्यकर्ता भी मौजूद थे। लेकिन कोई भी कांग्रेसी नेता एक लफ्ज तक नहीं बोला।

तीन तलाक पर पाबंदी का फैसला हो या मेंटीनेंस पाने का हक, मुस्लिम आधी आबादी लंबे अर्से से अपने अधिकारों के प्रति अंधेरे में रही है। उलेमाओं और मौलवियों ने ऐसे अधिकारों का हमेशा से विरोध किया है। वोट बैंक के लालच में कांग्रेस सहित दूसरे दलों ने हमेशा मुस्लिम महिलाओं को अधिकारों से वंचित करने की पैरवी की है। यदि ये दोनों अधिकार कांग्रेस आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं को कानूनी तौर पर मुहैया करा देती तो आज देश में मुसलमानो के विकास की सूरत अलग होती। किसी भी शिक्षित और जागरुक कौम को आसानी से बरगलाया नहीं जा सकता। गैरभाजपा विपक्षी दलों ने मुसलमानों को जागरुक करने और शिक्षित करने के लिए भी पर्याप्त कदम नहीं उठाए। यहां तक मुसलमानों के खैरख्वाह बनने का दंभ भरने वाले राजनीतिक दलों ने उन्हें राजनीति में पर्याप्त प्रतिनिधित्व तक नहीं दिया। यही वजह रही आजादी के बाद जितनी तरक्की मुसलमानों को करनी चाहिए थी, उसकी तुलना में पिछड़ गए।

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