“7 अहम संकेत: राजनाथ सिंह के बयान से सिंध पर बढ़ी उम्मीदें और पाकिस्तान में हलचल”

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  • • राजनाथ सिंह के बयान ने सिंध पर नई बहस छेड़ी • 2001 में आडवाणी का सिंध आत्मनिर्णय वाला बयान याद आया • सिंध भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान से गहराई से जुड़ा • पाकिस्तान में सिंध के हिंदुओं की स्थिति पर चर्चा • मुहाजिर समुदाय के असंतोष का ऐतिहासिक संदर्भ • पाकिस्तान की बदहाली में बदलते सामाजिक समीकरण • सिंध के भारत से जुड़ने की उम्मीदों में बढ़ोतरी

दक्षिण एशिया की राजनीति में जुलाई 2001 से जुड़ा एक अहम किस्सा आज फिर चर्चा में है, क्योंकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हालिया बयान ने भारत-पाकिस्तान संबंधों और सिंध के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी भर नहीं, बल्कि इतिहास, भूराजनीति और सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़ा एक संवेदनशील विषय बन गया है।

राजनाथ सिंह के बयान ने क्यों बढ़ाई सिंध पर चर्चा?

रक्षा मंत्री ने सार्वजनिक मंच पर कहा कि भविष्य में सिंध भारत का हिस्सा हो सकता है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान राजनीतिक और आर्थिक संकट में पहले से ही डूबा हुआ है। राजनाथ सिंह भारत सरकार के नंबर दो पद माने जाते हैं, इसलिए उनकी बात का वजन स्वतः बढ़ जाता है।

इस बयान का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इससे पहले 2001 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी सिंध के आत्मनिर्णय का मुद्दा उठा चुके थे। उस समय परवेज मुशर्रफ की भारत यात्रा को लेकर व्यापक कूटनीतिक हलचल थी। आडवाणी ने तब कहा था कि अगर पाकिस्तान कश्मीरपर बोलेगातो भारत सिंध का मुद्दा उठाएगा।

इसी पृष्ठभूमि की वजह से राजनाथ सिंह का कथन अचानक नए राजनीतिक अर्थ ग्रहण करने लगा है।

सिंध का भारत से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव

सिंध भारत की प्राचीन संस्कृति का एक गहरा हिस्सा रहा है।

यह वही भूमि है जहाँ से सिंधु नदी बहती है—भारत की सात पवित्र नदियों में से एक। हिंदू हर पूजा से पहले “गंगे  यमुने चैव… सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु” मंत्र पढ़ता है, जिसमें सिंधु का नाम शामिल है।

इससे साफ है कि भारतीय सभ्यता में सिंध का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक गहरा है।

सिंध विभाजन से पहले हिंदू बहुल क्षेत्र था।

कराची शहर में तो हिंदुओं की बड़ी आबादी रहती थी।

आडवाणी स्वयं सिंध के शरणार्थी परिवार से आते हैं।

उन्होंने सिंधु दर्शन यात्रा आयोजित करके इस भूमि से कटे लोगों की भावनाओं को जोड़ा था।

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सिंध में हिंदुओं की स्थिति और जनसंख्या

विभाजन के बाद सिंध में हिंदुओं की संख्या लगातार कम हुई है, फिर भी आज पाकिस्तान के कुल हिंदुओं में लगभग 49 लाख में से 47–49 लाख सिंध में ही रहते हैं।

2023 की जनगणना:

• सिंध की कुल आबादी – 5.57 करोड़

• हिंदुओं की हिस्सेदारी – लगभग 8.8%

• ग्रामीण क्षेत्रों में – लगभग 13.3%

• थारपारकर और उमरकोट जिले – हिंदू बहुल क्षेत्र

उमरकोट भारतीय सीमा से केवल 60 किमी दूर है, यानी भौगोलिक निकटता आज भी बनी हुई है।

विभाजन और सिंध पर उठती आवाजें

सिंध के भारत से कटने का निर्णय उस समय कई लोगों ने अव्यावहारिक माना था।

रेडक्लिफ द्वारा खींची गई विभाजन रेखा पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह संस्कृति, भूगोल और जमीनी हकीकत को समझे बिना बनाई गई थी—और कई जगह विभाजन का अस्वाभाविक स्वरूप दिखाई देता है।

सिंध में भारत से विलय की आवाजें बहुत तेज़ कभी नहीं रहीं, लेकिन धारा नीचे बहती रही।

दूसरी तरफ, पाकिस्तान में:

मुहाजिर समुदाय खुद को दोयम दर्जा महसूस करता रहा,

• MQM जैसे आंदोलन चले,

• पाकिस्तान ने इन आंदोलनों को भारत-समर्थक बताया।

बाल्टिस्तान, बलूचिस्तान और PoK में भारत से जुड़ने की मांगें बढ़ती रहीं, लेकिन सिंध अपेक्षाकृत शांत था।

हालाँकि, राजनाथ सिंह के बयान ने इस क्षेत्र की बहस को फिर जीवित कर दिया है।

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पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति और बदलता मनोविज्ञान

पाकिस्तान आज आर्थिक बदहाली, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है।

मुहाजिरों में हमेशा से यह भावना रही कि उन्हें बराबरी का सम्मान नहीं मिला।

सोशल मीडिया के युग में सिंध और पाकिस्तान के अन्य इलाकों के युवा भारत और पाकिस्तान की परिस्थितियों का सीधा तुलना कर पा रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में जब भारत के रक्षा मंत्री यह कहते हैं कि भविष्य में सिंध भारत का हिस्सा हो सकता है,”

तो यह बयान केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं, बल्कि उस भूगोल और इतिहास की याद दिलाता है जिसे 1947 ने दो हिस्सों में बांट दिया था।

क्या सच में सिंध भारत का हिस्सा बन सकता है?

यह एक राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक प्रश्न है जिसका उत्तर फिलहाल असंभव है।

लेकिन यह भी सच है कि—

राजनाथ सिंह का बयान:

• सिंध के हिंदुओं में नई उम्मीद जगा सकता है

• पाकिस्तान की राजनीति में हलचल बढ़ा सकता है

• भारत-पाक संबंधों की दिशा बदल सकता है

• विभाजन के इतिहास को पुनः विमर्श में ला सकता है

भूगोल कब हकीकत बनता है, यह समय ही बता पाएगा।

लेकिन इतिहास का यह पन्ना एक बार फिर खुल चुका है।

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