आजादी के लगभग आठ दशक पूरे करने के बाद भारतीय गणतंत्र एक ऐसे पड़ाव पर खड़ा है, जहाँ पीछे देखने से ज़्यादा आगे बढ़ने की ज़रूरत है। इन आठ दशकों की यात्रा ने भारत की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक-नैतिक मूल्यों को दुनिया के सामने स्थापित किया है। यही कारण है कि आज विश्व मंच पर भारत को सम्मान की दृष्टि से देखा जा रहा है और भारतवंशियों को हर देश में नई पहचान मिल रही है। उनकी प्रतिभा, मेहनत और नैतिकता का वैश्विक स्तर पर आदर हो रहा है।
- Republic Day India 2047 Vision और युवाशक्ति की भूमिका
- Republic Day India 2047 Vision और बदलती वैश्विक छवि
- Republic Day India 2047 Vision: सामाजिक चुनौतियाँ और विभाजन
- Republic Day India 2047 Vision और ‘अंतिम आदमी’ का सवाल
- Republic Day India 2047 Vision: संकल्प और प्रेरणा का जनवरी महीना
- क्या हम जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं?
अब सवाल यह है कि आने वाले कुछ वर्षों में, विशेषकर 2047 तक भारत को महाशक्ति और विश्वगुरु बनाने के सपने को हम कैसे साकार करेंगे। यह सपना केवल सरकारों का नहीं, बल्कि हर नागरिक की भागीदारी से पूरा होने वाला राष्ट्रीय संकल्प है।
Republic Day India 2047 Vision और युवाशक्ति की भूमिका
आजादी की लड़ाई के मूल्य भले ही समय के साथ कुछ धुंधले पड़े हों या राष्ट्रीय पर्व औपचारिकताओं में सिमटते दिखते हों, लेकिन यह सच्चाई है कि भारत की युवाशक्ति आज भी उसी जज़्बे से अपने देश से जुड़ी हुई है। जिस समर्पण और बलिदान से स्वतंत्रता सेनानियों ने आज़ादी का सपना देखा था, उसकी झलक आज की पीढ़ी में भी दिखाई देती है।
प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र में संवेदनशीलता पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन आम भारतीय आज भी ईमानदारी और नैतिकता में भरोसा रखता है। वह सीधे रास्ते से आगे बढ़ना चाहता है। यदि ऐसा न होता, तो भारतीय युवा विदेशों में जाकर विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, प्रबंधन और शोध के क्षेत्र में वैश्विक इतिहास न रच रहे होते।
जो युवा विदेशों में गए हैं, वे मजबूरी से नहीं, बल्कि अवसरों की तलाश में गए। यदि समान अवसर उन्हें अपने देश में मिलते, तो शायद वे अपनी मातृभूमि से दूर न जाते। इसके बावजूद, उन्होंने विदेशों में भारत के लिए एक ब्रांड एंबेसेडर की भूमिका निभाई है।
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Republic Day India 2047 Vision और बदलती वैश्विक छवि
कभी साँप-सपेरों और साधुओं की छवि में देखे जाने वाले भारत को आज दुनिया एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में देख रही है। तेज़ आर्थिक सुधारों, तकनीकी प्रगति और बाज़ार विस्तार ने भारत को वैश्विक निवेश के लिए एक आकर्षक केंद्र बना दिया है।
विदेशी देशों का भारत की ओर आकर्षण किसी संयोग का परिणाम नहीं है। यह उस आत्मविश्वास का नतीजा है, जो बीते एक दशक में नेतृत्व और आम नागरिक—दोनों में विकसित हुआ है। बाज़ारवाद के शोर के बीच भी शिक्षा, आर्थिक स्थिति और सामाजिक ढाँचे में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। भले ही ये परिवर्तन अभी मुख्यतः मध्यवर्ग तक सीमित दिखते हों, लेकिन आने वाले समय में इनका प्रभाव समाज के अंतिम पायदान तक पहुँचना तय है।
Republic Day India 2047 Vision: सामाजिक चुनौतियाँ और विभाजन
भारत आज भी कई स्तरों पर बँटा हुआ है—भाषा, जाति, धर्म और प्रांतवाद की दीवारों से। कुछ दीवारें ऐतिहासिक हैं, तो कुछ हमने खुद खड़ी की हैं। और कुछ ऐसी भी हैं, जिन्हें भारत का बुरा चाहने वाली ताकतें लगातार मजबूत कर रही हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जब देश बँटा हुआ दिखता है, तो आम भारतीय का मन व्यथित हो जाता है। घुसपैठ, अतिवाद और उग्र आंदोलनों की समस्या आज भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। वोट बैंक की राजनीति और सत्ता की होड़ ने कई बार मूल्यों को उलट दिया है। ऐसे में जनता के विश्वास की रक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।
विडंबना यह है कि आज भी वही प्रश्न हमारे सामने खड़े हैं, जिनके कारण देश का विभाजन हुआ था। अतिवादी आंदोलन, चाहे वे किसी भी विचारधारा से प्रेरित हों, विकास की गति में बाधा ही बनते हैं।
Republic Day India 2047 Vision और ‘अंतिम आदमी’ का सवाल
गणतंत्र को सार्थक बनाने के लिए साधन-संपन्न और हाशिये पर खड़े व्यक्ति को एक ही तल पर देखना होगा। आज़ादी तभी अर्थपूर्ण है, जब वह हर नागरिक को समान अवसर दे। कानून में समानता की बात नारे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; वह व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।
डॉ. राममनोहर लोहिया का कथन—“लोकराज लोकलाज से चलता है”—आज भी उतना ही प्रासंगिक है। पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद और महात्मा गांधी का ‘अंतिम व्यक्ति’ का दर्शन यही सिखाता है कि विकास का मूल्यांकन आखिरी आदमी की स्थिति से होना चाहिए।
सूचकांक और रैंकिंग तभी सार्थक हैं, जब वे आम आदमी के चेहरे पर मुस्कान ला सकें।
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Republic Day India 2047 Vision: संकल्प और प्रेरणा का जनवरी महीना
गणतंत्र दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन की जिम्मेदारी लेकर आता है। आतंकवाद, नक्सलवाद और क्षेत्रीयता जैसी चुनौतियों के बावजूद जनता का लोकतंत्र में विश्वास बना रहना भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
जनवरी का महीना संकल्पों और प्रेरणा का महीना है—स्वामी विवेकानंद की जयंती, जिन्होंने भारत को आत्मविश्वास दिया; नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती, जिन्होंने विदेशी धरती पर भारत का सम्मान बचाया; और गणतंत्र दिवस, जिसने नागरिकों को सत्ता का स्रोत बनाया।
नया साल केवल कैलेंडर बदलने का नाम नहीं, बल्कि अपने गणतंत्र में नई ऊर्जा भरने का अवसर है।
क्या हम जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं?
भारत को महाशक्ति बनाना किसी एक सरकार या वर्ग का काम नहीं है। यह हर भारतीय की साझी जिम्मेदारी है। वंचितों को पीछे छोड़कर कोई सपना पूरा नहीं हो सकता।
गणतंत्र दिवस हमसे यह सवाल पूछता है—क्या हम भरोसा जोड़ पाएंगे? क्या हम लोकतंत्र को मज़बूत करेंगे? क्या हम 2047 के सपने के साथ खड़े होने का साहस दिखाएंगे?
यदि उत्तर हाँ है, तो भारत का भविष्य उज्ज्वल है।
और यदि नहीं—तो अभी भी समय है।
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