Rohini Acharya Post : सावित्रीबाई फुले जयंती पर महिला सम्मान को ले कर तंज ! बोली….

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Rohini Acharya ने सावित्रीबाई फुले जयंती पर सोशल मीडिया पोस्ट किया
Highlights
  • • सावित्रीबाई फुले जयंती पर रोहिणी आचार्य का पोस्ट • महिला अधिकार और आत्मसम्मान पर जोर • सोशल मीडिया पर यूजर्स निकाल रहे राजनीतिक मायने • 15 नवंबर को परिवार और राजनीति से नाता तोड़ने का ऐलान • लालू परिवार की आंतरिक कलह फिर चर्चा में

राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में आ गई हैं। इस बार वजह है उनका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किया गया एक भावनात्मक और वैचारिक पोस्ट, जिसमें उन्होंने सावित्रीबाई फुले की जयंती पर महिलाओं के अधिकारों और आत्मसम्मान की बात कही। पोस्ट सामने आते ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई और यूजर्स इसके अलग-अलग अर्थ निकालने लगे।

बीते कुछ महीनों से रोहिणी आचार्य के सोशल मीडिया पोस्ट लगातार सुर्खियों में रहे हैं। उनके हर शब्द को लालू परिवार के भीतर चल रहे कथित तनाव और राजद की आंतरिक राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

Rohini Acharya Post: सावित्रीबाई फुले के विचारों के जरिए महिला सम्मान पर जोर

रोहिणी आचार्य ने एक्स पर लिखा कि उन्हें खुशी है कि पूरा देश सावित्रीबाई फुले की जयंती मना रहा है। उन्होंने सावित्रीबाई फुले के विचारों को उद्धृत करते हुए लिखा कि जो समाज स्त्री को नीचा दिखाकर पुरुष को ऊंचा साबित करता है, वह असल में कमजोर सोच का परिचायक है।

उनके शब्दों में स्त्री आत्मसम्मान, बराबरी और सामाजिक पाखंड के खिलाफ गहरी पीड़ा झलकती है। पोस्ट में यह भी कहा गया कि स्त्री को पापी बताने वाला समाज, अपने पाप छुपाना चाहता है। यही पंक्तियां सोशल मीडिया पर बहस का केंद्र बन गई हैं।

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Rohini Acharya Post: यूजर्स क्यों निकाल रहे हैं राजनीतिक संकेत

Rohini Acharya Post : सावित्रीबाई फुले जयंती पर महिला सम्मान को ले कर तंज ! बोली…. 1

इस पोस्ट के सामने आते ही सोशल मीडिया पर यूजर्स ने इसे केवल सामाजिक टिप्पणी मानने से आगे बढ़कर राजनीतिक संकेतों के रूप में देखना शुरू कर दिया। कई लोगों का मानना है कि यह पोस्ट लालू परिवार में चल रहे आंतरिक विवाद और महिला सम्मान से जुड़े व्यक्तिगत अनुभवों की ओर इशारा करता है।

हालांकि, रोहिणी आचार्य ने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन पोस्ट का भाव और भाषा लोगों को कई सवालों की ओर ले जा रही है।

Rohini Acharya Post: 15 नवंबर की घोषणा ने बदली सियासी तस्वीर

रोहिणी आचार्य इससे पहले 15 नवंबर को एक पोस्ट के जरिए यह घोषणा कर चुकी हैं कि वह परिवार और राजनीति दोनों से नाता तोड़ रही हैं। इस ऐलान ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी थी।

उसके बाद उन्होंने पटना स्थित राबड़ी आवास, 10 सर्कुलर रोड छोड़ दिया था। यह कदम केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा गया। इस घटना के बाद रोहिणी आचार्य का नाम लगातार चर्चा में बना रहा।

Rohini Acharya Post: लालू परिवार में कलह के आरोप

राबड़ी आवास छोड़ने के बाद मीडिया से बातचीत में रोहिणी आचार्य ने बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के करीबी संजय यादव और रमीज पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि इन्हीं लोगों के कारण लालू परिवार में कलह पैदा हुई।

इसके बाद एक और पोस्ट में उन्होंने तेजस्वी यादव और संजय यादव पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि उनसे उनका मायका छीन लिया गया। उन्होंने खुद को अनाथ किए जाने और अपमानित किए जाने की बात भी कही थी।

Rohini Acharya Post: भावनात्मक शब्दों ने बढ़ाई संवेदनशीलता

रोहिणी आचार्य के पुराने और नए पोस्ट को एक साथ देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि उनके शब्द केवल सामाजिक संदेश नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पीड़ा और आत्मसम्मान की लड़ाई को भी दर्शाते हैं।

महिला अधिकार, सम्मान और स्वतंत्रता जैसे विषयों पर उनका लगातार बोलना उन्हें एक अलग पहचान देता है। यही वजह है कि उनका हर पोस्ट राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन जाता है।

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Rohini Acharya Post: आगे क्या संकेत दे रहा है यह पोस्ट

सावित्रीबाई फुले की जयंती पर किया गया यह पोस्ट ऐसे समय आया है, जब लालू परिवार और राजद पहले से ही कई सवालों और चर्चाओं से घिरा हुआ है। ऐसे में यह पोस्ट भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक या सामाजिक फैसले की भूमिका भी माना जा रहा है।

फिलहाल रोहिणी आचार्य ने कोई सीधा राजनीतिक बयान नहीं दिया है, लेकिन उनके शब्दों की गूंज बिहार की राजनीति में साफ सुनाई दे रही है।

Rohini Acharya Post: सोशल मीडिया से सियासत तक असर

आज के दौर में सोशल मीडिया केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक संदेश देने का सशक्त जरिया बन चुका है। रोहिणी आचार्य का यह पोस्ट भी इसी का उदाहरण है, जहां एक सामाजिक विचार सियासी बहस में बदल गया।

उनका यह संदेश महिला अधिकारों की बात करते हुए सत्ता, परिवार और समाज के रिश्तों पर भी सवाल खड़े करता है।

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