मकर संक्रांति से पहले ही बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बार वजह कोई चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल के नेता और लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की सक्रियता है। मकर संक्रांति के दिन होने वाले दही-चूड़ा भोज की तैयारियों ने सियासी गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह आयोजन सिर्फ एक परंपरा है या फिर इसके जरिए राजद की आंतरिक राजनीति में कोई बड़ा संदेश देने की तैयारी हो रही है।
- Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: क्यों खास है यह आयोजन?
- Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: लालू की परंपरा, तेजप्रताप की जिम्मेदारी
- Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: NDA नेताओं को न्योता, सियासी संकेत?
- Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: क्या तेजस्वी यादव पर दबाव की रणनीति?
- Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: राजद के अंदर बदलते समीकरण
Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: क्यों खास है यह आयोजन?
बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति का दही-चूड़ा भोज केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा है। यह हमेशा से राजनीतिक संकेतों का मंच रहा है। वर्षों पहले लालू प्रसाद यादव ने इस परंपरा को सियासी पहचान दी थी। उनके दही-चूड़ा भोज में सत्ता और विपक्ष, दोनों खेमों के बड़े नेता शामिल होते थे।
यह आयोजन केवल मेल-मिलाप तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि यहीं से कई राजनीतिक समीकरण और भविष्य की रणनीतियों के संकेत भी निकलते थे। यही वजह है कि आज भी दही-चूड़ा भोज को बिहार की राजनीति में खास महत्व दिया जाता है।
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Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: लालू की परंपरा, तेजप्रताप की जिम्मेदारी
अब हालात बदल चुके हैं। लालू प्रसाद यादव अस्वस्थ हैं और सक्रिय राजनीति से दूर हैं। वहीं, तेजस्वी यादव अपेक्षाकृत अलग राजनीतिक शैली के लिए जाने जाते हैं और ऐसे पारंपरिक आयोजनों में उनकी रुचि सीमित मानी जाती है।
ऐसे में राजद की इस सियासी विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी तेजप्रताप यादव ने अपने कंधों पर ले ली है। 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन वे एक बड़े राजनीतिक दही-चूड़ा भोज का आयोजन करने जा रहे हैं, जिसे लेकर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा तेज है।
Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: NDA नेताओं को न्योता, सियासी संकेत?
इस आयोजन को खास बनाने के लिए तेजप्रताप यादव खुद मैदान में उतर चुके हैं। वे व्यक्तिगत रूप से नेताओं के आवास पर जाकर उन्हें भोज का निमंत्रण दे रहे हैं। हाल ही में वे पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के घर पहुंचे और उन्हें दही-चूड़ा भोज का न्योता दिया।
इतना ही नहीं, उन्होंने बिहार के डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा को भी आमंत्रण दिया है। सबसे अहम बात यह है कि तेजप्रताप ने पार्टी की सीमाओं से बाहर निकलते हुए लगभग सभी एनडीए घटक दलों के नेताओं को भी निमंत्रण भेजना शुरू कर दिया है।
राजनीतिक गलियारों में इसे तेजप्रताप की बड़ी सियासी फील्डिंग के रूप में देखा जा रहा है। एनडीए नेताओं को बुलाने का कदम सिर्फ शिष्टाचार है या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक संदेश छिपा है, इस पर बहस तेज हो गई है।
Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: क्या तेजस्वी यादव पर दबाव की रणनीति?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तेजप्रताप यादव यह सब अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव को सियासी चुनौती देने के लिए कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, तेजप्रताप जल्द ही तेजस्वी यादव को भी इस भोज का निमंत्रण देने वाले हैं।
यदि ऐसा होता है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि तेजस्वी यादव इस आयोजन में शामिल होते हैं या नहीं। उनकी मौजूदगी या अनुपस्थिति, दोनों ही स्थितियों में सियासी संदेश निकल सकता है। यही वजह है कि यह भोज राजद के आंतरिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।
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Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: राजद के अंदर बदलते समीकरण
राजद के भीतर लंबे समय से नेतृत्व और भूमिका को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। तेजप्रताप यादव अक्सर अपने बयानों और गतिविधियों से अलग पहचान बनाते रहे हैं। दही-चूड़ा भोज जैसे बड़े आयोजन के जरिए वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी की परंपराओं और जनसंपर्क राजनीति में उनकी भी मजबूत पकड़ है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आयोजन तेजप्रताप को एक बार फिर केंद्र में लाने का प्रयास हो सकता है। इससे पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस भी शुरू हो सकती है।
Tej Pratap Yadav Makar Sankranti Dahi Chura Feast: परंपरा या भविष्य की राजनीति का संकेत?
कुल मिलाकर, मकर संक्रांति से पहले तेजप्रताप यादव की सक्रियता ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। यह दही-चूड़ा भोज सिर्फ एक पारंपरिक आयोजन है या फिर राजद और बिहार की राजनीति में किसी बड़े बदलाव का संकेत, इसका जवाब 14 जनवरी के बाद ही साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि इस आयोजन ने सियासी तापमान को जरूर बढ़ा दिया है।
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