डॉ. कृष्णा अनुराग
(सहायक प्राध्यापक, बीएमएस कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड मैनेजमैंट, बेंगलुरु )
21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर कर्नाटक में कई तरह के सांस्कृतिक, साहित्यिक और मातृभाषा पर केंद्रित कार्यक्रम तथा राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। ऐतिहासिकता और आधुनिकता का विराट संगम बेंगलुरु अपने भीतर इतना कुछ समेटे हुए है कि अगर उसका सही ढंग से अवलोकन किया जाए तो यह संपूर्ण भारत को न केवल प्रभावित कर सकता है बल्कि पथ–प्रदर्शित भी कर सकता है। पूरी दुनिया में भारत के ‘सिलिकॉन वैली’ के रूप में प्रसिद्ध बेंगलुरु में केवल ग्लोबल आईटी कंपनियों के दफ्तर ही नहीं हैं बल्कि इस नगर में सम्पूर्ण भारत के किसी भी शहर की तुलना में अधिक उच्च शिक्षण संस्थान भी हैं।
जरूरी बात यह है कि यहाँ के लगभग सभी संस्थान अपनी भाषा, संस्कृति और परम्परा से बेहद मजबूती के साथ जुड़े हुए हैं। न केवल शिक्षण संस्थानों में बल्कि टोले–मोहल्ले के स्तर पर भी यह बात स्पष्ट रूप से नजर आती है। लोग नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और मातृभाषा से जोड़ने का हर संभव प्रयास करते दिखलाई पड़ते हैं। केवल बेंगलुरु या कर्नाटक ही नहीं बल्कि भारत के सभी दक्षिणी राज्यों की यही स्थिति है। लोग अपनी भाषा और परम्परा को लेकर बेहद सजग हैं। वे पश्चिम का या विदेशी भाषा का अंधानुकरण नहीं कर रहे हैं। इन सब स्थितियों को देखने के बाद यह सवाल उठता है कि क्या बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग भी अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और परम्परा को ले कर इतने जागरूक हैं। स्पष्ट रूप से उक्त प्रश्न का उत्तर नकारात्मक है।
उत्तर भारत के निवासी सृजनात्मकता, रचनात्मकता से कहीं अधिक नकारात्मकता से ग्रस्त नजर आते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस इलाके को देश की हिंदी पट्टी कहा जाता है, आज वहाँ लोग अपने बच्चों को दूसरों के समक्ष यह कह कर प्रस्तुत करते हैं कि यह फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है। मातृभाषा के प्रति उत्तर भारतीयों की यह संवेदनहीनता समझ से परे है। यह जगजाहिर बात है कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम है। इसके बावजूद हिंदी पट्टी में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वालों को देवतुल्य सम्मान दिया जाता है और मातृभाषा में बोलने वालों को अनपढ़, गंवार और न जाने किन विशेषणों से संबोधित किया जाता है। दरअसल यह सोच कोलोनियल दिवालियापन का प्रतीक है।
हिंदी में एक कहावत भी है कि ‘अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी को छोड़ गए।’ समग्र रूप से देखा जाए तो भारत के दक्षिणी प्रांत के लोग कोलोनियल मासिकता से कभी भी उस कदर भयाक्रांत नहीं रहे जैसे उत्तर भारत के लोग रहे और वर्तमान समय में भी हैं। आज भी अगर उत्तर भारत के अभिभावकों को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए मातृभाषा और अंग्रेजी में से किसी एक को चुनने का विकल्प मिले तो निश्चित रूप से वे अंग्रेजी की ओर ही आकर्षित होंगे। दक्षिणी राज्यों में यह प्रवृत्ति कम है। विशेष रूप से कर्नाटक में न केवल कन्नड़ बल्कि हिंदी को भी बहुत सम्मान दिया जाता है। स्कूलों और कॉलेजों में अनिवार्य रूप से हिंदी की पढ़ाई होती है। दूसरी ओर उत्तर भारत के राज्यों में शायद ही कोई स्कूली हो जहाँ दक्षिण भारत की भाषाओं को पढ़ाया जाता हो। दक्षिण भारतीयों ने न केवल अपनी भाषा को बल्कि धर्म, संस्कृति और परम्परा को भी सहेजा है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी उसे आगे भी बढ़ाया है। यह आश्चर्यजनक है कि जिस उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम और श्री कृष्ण की जन्मभूमि है, जिस बिहार में माता सीता का जन्मस्थान है वहाँ के लोग केवल पर्व–त्योहार के दिन ही उन्हें याद कर के अपना दायित्व पूरा कर लेते हैं। धार्मिक–सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध उत्तर प्रदेश–बिहार के लोग अगली पीढ़ी को भी अपने सांस्कृतिक इतिहास का ज्ञान नहीं दे पाते।
उत्तर प्रदेश और बिहार के बड़े इलाके में बोली जाने वाली भोजपुरी भाषा आज तक उस सम्मान को नहीं प्राप्त कर सकी है, जिसकी वह हकदार है। आठवीं अनुसूची में भारत की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं को स्थान मिल चुका है लेकिन भोजपुरी उस सूची में आज तक शामिल नहीं हो सकी है। इसके लिए कोई और दोषी नहीं है बल्कि वे लोग दोषी हैं, जिनकी मातृभाषा भोजपुरी है। आज भोजपुरी और अश्लीलता एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भिखारी ठाकुर जैसे महान साहित्यकार ने जिस भाषा में कालजयी रचनाओं का सृजन किया, आज वह केवल अश्लीलता के लिए ही जानी जाती है। इन स्थितियों के लिए सरकार और संस्थाएं दोषी नहीं हैं बल्कि वह पूरा समाज दोषी है जो अपनी भाषा की बेहतरी और उन्नति के लिए कोई उपक्रम नहीं करता है।
दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषा और साहित्य के प्रति बेहद जागरूक हैं, वे मातृभाषा के महत्त्व को समझते हैं। यही कारण है कि इक्कीसवीं सदी में भी कन्नड़, मलयालम, तेलुगु और तमिल जैसी भाषाओं में विपुल परिमाण में विश्व स्तर के साहित्य की रचना हो रही है जबकि भोजपुरी, मैथिली, अवधि, ब्रजभाषा, अंगिका, बज्जिका आदि की उत्कृष्ट रचना ढूंढने पर भी नहीं मिलती।
आज दक्षिण भारत में हिंदी भाषियों के साथ जो भेदभावपूर्ण व्यवहार हो रहा है उसके पीछे कुछ गंभीर कारण हैं। दरअसल इस सच को खारिज नहीं किया जा सकता कि भाषा, संस्कृति, परम्परा आदि को लेकर उत्तर भारतीय दक्षिण भारतीयों की तुलना में कम सजग हैं। कर्नाटक–तमिल नाडु जैसे राज्यों में नौकरी करने या शिक्षा ग्रहण करने आने वाले लोग यहाँ भी भाषा के महत्त्व को नजरअंदाज करते हैं। उच्चाधिकारी वर्ग के लोग अंग्रेजी बोल कर रौब गांठने की कोशिश करते हैं तो निम्न–मध्यम वर्गीय लोग कन्नड़ आदि क्षेत्रीय भाषा नहीं सीखने की जिद कर के अपनी मातृभाषा की तरह यहाँ की भाषा का भी तिरस्कार करने का प्रयास करते हैं। यह समझने की जरूरत है कि मातृभाषा अस्मिता और अस्तित्व का प्रतीक है। मातृभाषा का मामला एकांगी नहीं है बल्कि यह संस्कृति, इतिहास और परम्परा से जुड़ा हुआ है। जैसे किसी भी स्थिति में माँ को नहीं बदला जा सकता है ठीक उसी प्रकार मातृभाषा की जगह कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती है।
पूरी प्रामाणिकता के साथ यह दावा किया जा सकता है कि उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण भारतीयों से सीखने की जरूरत है। उत्तर भारत के लोग आज भी आँखें बंद कर के पश्चिम का अंधानुकरण करने में लगे हुए हैं। लेकिन दक्षिण भारत की परिस्थितियां वैसी नहीं हैं जिसकी कल्पना दूर बैठ कर हिंदी पट्टी के लोग करते हैं। यहाँ के लोग अपनी जड़ों से इस कदर जुड़े हैं कि उसकी कल्पना पटना, लखनऊ, बनारस में बैठ कर नहीं की जा सकती है। भारत के दक्षिणी प्रांतों कि संस्कृति को करीब से देखने के बाद ही यह समझ आता है कि क्यों दक्षिण भारत के तीर्थयात्रियों से बनारस और अयोध्या की गलियाँ भरी रहती हैं।
हिंदी पट्टी में अंग्रेजी का आकर्षण और दक्षिण में मातृभाषा पर जोर

