गणेश दत्त पाठक
(वरिष्ठ स्तंभकार)
भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। कुछ कहते हैं कि भारतीय संविधान बेहद मजबूत है और समय के साथ अपनी प्रासंगिकता को साबित करता रहा है। वहीं कुछ का कहना है कि भारतीय संविधान बेहद कमजोर है। लेकिन तथ्य यह भी है कि भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा और लिखित संविधान है, जिसमें लचीलापन और कठोरता का अनूठा संतुलन है, जो इसे विविधता और जटिल चुनौतियों के बावजूद इसे टिकाऊ और मजबूत बनाता दिखता है। हालांकि भारतीय संविधान को कभी कभी जटिलता के कारण वकीलों के लिए बहुत लाभदायक भी बताया जाता रहा है। लेकिन यह भी तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारतीय संविधान अपनी गहराई, अनुकूलन क्षमता और लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण एक मजबूत आधार भी ग्रहण करता है, जिसने समय के साथ देश की स्थिरता और प्रगति भी दी है।
26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा अपनाया गया यह संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और तब से देश की प्रगति और दिशा को निर्देशित करता हुआ अपनी 75 वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। तब इस बात का मंथन जरूरी हो जाता है कि भारतीय संविधान आखिर कितना सशक्त है?
संविधान सभा के सिद्धांत का दर्शन सर्वप्रथम बाल गंगाधर तिलक के निर्देशन में निर्मित स्वराज विधेयक में मिलता है। 1922 में महात्मा गांधी ने संविधान सभा के गठन पर बल दिया। हरिजन पत्रिका में उन्होंने लिखा कि भारतीय संविधान का भारतीयों के इच्छा के अनुसार ही होगा। अप्रैल 1923 में गठित सप्रू समिति ने कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल का प्रारूप तैयार किया। इसे 1925 में गांधी जी की अध्यक्षता वाले दिल्ली सर्वदलीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। यह संविधान निर्माण की दिशा में पहला महत्वपूर्ण प्रयास था।
1942 में क्रिप्स मिशन ने भारतीय संविधान सभा के गठन की बात को स्पष्टतया स्वीकार किया गया। ब्रिटिश सरकार ने भारत के लिए एक संविधान सभा का गठन करने के लिए 1946 में कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा की। भारतीय संविधान सभा का गठन किया गया, जिसमें 389 सदस्य थे। इनका चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा किया गया था। देश के विभाजन के बाद संविधान सभा के 299 सदस्य ही रह गए। जिसमें 229 सदस्य प्रांतों से और 70 सदस्य देशी रियासतों के थे। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की प्रथम बैठक में डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थाई अध्यक्ष चुना गया। 11 दिसंबर, 1946 को डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष और एच सी मुखर्जी को उपाध्यक्ष चुना गया। सर बी एन राव को संविधान सभा का सलाहकार नियुक्त किया गया।
संविधान निर्माण का प्रारंभ 13 दिसंबर, 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव से हुआ। संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी एन राव द्वारा संविधान का पहला प्रारूप तैयार किया गया था, जिसमें 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थीं। संविधान के प्रारूप को तैयार करने के लिए 29 अगस्त, 1947 को प्रारूप समिति का विधिवत गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष बने डॉक्टर भीम राव आंबेडकर। 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन की अवधि के बाद 26 नवंबर, 1949 को अपनाए गए संविधान में प्रस्तावना, 22 भाग, 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियां थीं। इसमें से 16 अनुच्छेद उसी दिन से लागू हो गए जबकि 26 जनवरी 1950 से पूरा संविधान लागू हुआ।
भारतीय संविधान के 75 वर्षों के सफर को चार मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है। 1950 से 1975 तक का दौर वह समय रहा जब संविधान की मूल आत्मा को स्थापित किया गया। 1976 से 1990 को स्थिरता और सुधार की अवधि माना जाता रहा है। 1991 से 2000 तक की अवधि आर्थिक सुधार और वैश्वीकरण की रही जबकि 2001 से 2025 तक की अवधि में सामाजिक और आर्थिक विकास के सफर पर देश चलता रहा है।
भारतीय संविधान के मुख्य विशेषताओं की बात करें तो वह लोकतंत्र को बढ़ावा देता है, जहां लोगों की शक्ति को मान्यता दी जाती है। भारतीय संविधान एक संघीय संरचना को अपनाता है, जो केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन करता है। संविधान भारतीयों को मूल अधिकार को प्रदान करता है । संविधान में नीति निर्देशक तत्व भी है, जो सरकार को सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए निर्देश देता है। यह विश्व का सबसे बड़ा संविधान है जिसमें तकरीबन हर तथ्य को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को लचीला बनाया गया है। इसमें संशोधन की प्रक्रिया संतुलित है कुछ हिस्से आसानी से बदले जा सकते हैं जबकि कुछ के लिए विशेष बहुमत और राज्यों का समर्थन चाहिए होता है, जिससे संविधान की मूल भावना सुरक्षित रहती है। भारत में एक सशक्त और स्वतंत्र न्यायपालिका संविधान की व्याख्या करती है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है। जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकारें भी संविधान के दायरे में रहे। भारतीय संविधान ने भारत की भाषाई सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता को समाहित किया है। जिससे देश एक साथ जुड़ा रहता है और नागरिक अधिकारों का सम्मान होता है। मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं और नागरिकों का विश्वास इसे और मजबूत बनाता रहा है।
हालांकि कुछ आलोचकों का मानना है कि कभी कभी राजनीतिक इच्छा शक्ति के कमी के कारण इसके सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं हो पाता है। कुछ लोग हाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं मसलन चुनाव आयोग, सूचना आयोग में किए गए कुछ बदलाओं को लेकर भी सवाल उठाते हैं। आलोचक यह भी कहते हैं कि भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा संविधान है, जिसमें 448 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ हैं। यह जटिल और समझने में मुश्किल है।
वर्तमान समय में सबसे बड़ी आवश्यकता संवैधानिक मूल्यों के महत्व को समझने और विशेषकर युवाओं में इन मूल्यों को ग्रहण करने की शिद्दत से महसूस की जा रही है। सामान्य तौर पर ये संवैधानिक मूल्य वे मूलभूत सिद्धांत हैं, जो एक देश के संविधान में समाहित होते हैं और उस देश के नागरिकों के लिए एक मार्गदर्शक के तौर पर कार्य करते हैं। ये मूल्य देश के शासन, समाज और नागरिकों के बीच संबंधों को निर्धारित करते हैं। समानता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुत्व, लोकतंत्र, संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता आदि भारतीय संविधान में समाहित कुछ प्रमुख संविधानिक मूल्य हैं।
युवाओं में संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना को जागृत करने के लिए बहुस्तरीय प्रयासों में समन्वय और सामंजस्य की आवश्यकता है।विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में नियमित अंतराल पर विचार गोष्ठियों, निबंध प्रतियोगिताओं का आयोजन होना चाहिए। विद्यालयों में भारतीय संविधान की प्रस्तावना के बैनर जगह जगह लगाए जाने चाहिए। युवाओं को सामाजिक जागरूकता के बारे में भी शिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे समाज में हो रहे बदलावों को समझ सके और उनमें सहभागिता निभा सके। युवाओं को संविधानिक मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करने हेतु रोल मॉडल की आवश्यकता होती है। यह शिक्षक, नेता या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति हो सकता सकते हैं। उन्हें संविधानिक मूल्यों के बारे में जानकारी देने और उन्हें अपनाने के लिए प्रेरित करने के लिए सोशल मीडिया, ब्लॉग आदि का उपयोग किया जा सकता है। सामुदायिक सेवा में भाग लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे वे समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें। सामुदायिक, सामाजिक और सामाजिक संस्कृतिक संस्थाएं भी इस संदर्भ में बड़ी भूमिका निभा सकती है। परिवार के स्तर पर भी संविधानिक मूल्यों के पालन के प्रति प्रोत्साहन मिलना चाहिए। आज के डिजिटल युग में जब अधिकांश युवा मोबाइल से चिपके रहते हैं संविधानिक मूल्यों के संदर्भ में संवाद को बढ़ावा देने के प्रयास करना चाहिए। जिससे वे अपने विचारों को व्यक्त कर सकें और दूसरे के विचारों को समझ सके। संवैधानिक मूल्यों के परिपालन के कई सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। इससे जहां एक तरफ हमारे देश में लोकतंत्र को मजबूती मिल सकती है वहीं दूसरी तरफ देश आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर मजबूत भी होता है। संवैधानिक मूल्यों के पालन से नागरिकों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है और देश को बाहरी चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलती है। देश में एकता, सद्भाव, सौहार्द की भावना बढ़ती है। देश के नागरिकों को स्वतंत्रता, समानता, न्याय की प्राप्ति भी सुनिश्चित होती है।
भारतीय संविधान ने 75 वर्ष के सफर में कई बड़ी चुनौतियों का सामना किया लेकिन आज देश यदि विकास के पथ पर दौड़ रहा है तो संविधान द्वारा निर्देशित तथ्य भी महत्वपूर्ण हैं। यदि हमारी भावी पीढ़ी भी संवैधानिक मूल्यों के प्रति श्रद्धा और सम्मान रखती है तो निश्चित तौर पर हमारा भारतीय संविधान भविष्य में भी सशक्त रहेगा।
समय के साथ सशक्त होता भारतीय संविधान भारतीय संविधान के 75 वर्षों का सफर रहा है निराला, गुजरते समय के साथ भारतीय संविधान की बढ़ती जा रही प्रासंगिकता

