भारत और बांग्लादेश के रिश्ते कभी कारोबार, सहयोग और साझेदारी के प्रतीक माने जाते थे, लेकिन 2024 के मध्य और 2025 की शुरुआत के बाद परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। अब यह संबंध सहयोग से अधिक रणनीतिक दबाव और कूटनीतिक तनाव के नए दौर में प्रवेश करते दिख रहे हैं। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि भारत के कुछ भू-राजनीतिक विकल्प बांग्लादेश के लिए अस्तित्व से जुड़े सवाल बनते जा रहे हैं।
Three Bigha Corridor Bangladesh Crisis और भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ता तनाव
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता के बाद भारत के साथ उसके रिश्तों में स्पष्ट ठंडापन आया है। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद ढाका की नई राजनीतिक दिशा भारत के लिए सतर्कता का विषय बन गई है। ऐसे समय में भारत के पास मौजूद रणनीतिक विकल्प—विशेषकर सीमावर्ती संपर्क और जल नियंत्रण से जुड़े मुद्दे—बांग्लादेश के लिए बेहद संवेदनशील बन गए हैं।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित एक संकरा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण गलियारा वर्षों से दोनों देशों के रिश्तों में एक मौन कारक रहा है। यह गलियारा भारत के लिए भौगोलिक संपर्क का माध्यम है, जबकि बांग्लादेश के लिए यह एक ऐसी नस है जिस पर देश की आंतरिक आवाजाही और संतुलन निर्भर करता है।
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फरक्का जल समझौता 2026 और Three Bigha Corridor Bangladesh Crisis का सीधा संबंध

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर फरक्का संधि एक अहम आधार रही है। पहली बार यह समझौता 1977 में हुआ और फिर 1996 में इसे नए सिरे से लागू किया गया। यह संधि 2026 में समाप्त हो रही है और इसमें स्वतः विस्तार का कोई प्रावधान नहीं है।
समझौते के तहत पानी के प्रवाह के अनुसार भारत और बांग्लादेश के बीच जल वितरण तय होता है। भारत को न्यूनतम आवश्यक जल अपने क्षेत्रों के लिए रखना होता है और शेष पानी बांग्लादेश को दिया जाता है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा असर बांग्लादेश की कृषि पर पड़ता है, क्योंकि देश की लगभग 30 प्रतिशत खेती इसी जल पर निर्भर है।
यदि यह संधि नवीनीकृत नहीं होती या इसमें कठोर शर्तें लागू होती हैं, तो बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर कृषि संकट, जल अभाव और सामाजिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।
Three Bigha Corridor Bangladesh Crisis में भारत का रणनीतिक संदेश
भारत की हालिया कूटनीतिक और रणनीतिक नीतियां यह संकेत देती हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों में अब नरमी की गुंजाइश कम है। पाकिस्तान के मामले में सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला इसी बदले हुए दृष्टिकोण का उदाहरण है।
यदि पड़ोसी देश भारत विरोधी गतिविधियों या बाहरी शक्तियों के प्रभाव में आकर कदम उठाते हैं, तो भारत अपने संसाधनों और रणनीतिक साधनों के इस्तेमाल से पीछे नहीं हटेगा—यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया जा चुका है।
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Three Bigha Corridor Bangladesh Crisis और बांग्लादेश का भविष्य
बांग्लादेश के लिए आने वाले महीने निर्णायक साबित हो सकते हैं। एक ओर नई सरकार के सामने आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और जल प्रबंधन की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर भारत के साथ रिश्तों को संतुलित रखना भी उतना ही आवश्यक है।
भारत के साथ टकराव की नीति अपनाने से बांग्लादेश को तत्काल राजनीतिक लाभ भले दिखे, लेकिन दीर्घकालिक रूप से इसका असर देश की अर्थव्यवस्था, खेती और आंतरिक स्थिरता पर भारी पड़ सकता है। यही कारण है कि ढाका के लिए अब टकराव नहीं, संवाद और संतुलन ही सबसे व्यावहारिक रास्ता माना जा रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक जल समझौते या सीमावर्ती गलियारे तक सीमित नहीं है। यह दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक वास्तविकताओं, शक्ति संतुलन और रणनीतिक सोच का प्रतीक बन चुका है। आने वाला समय तय करेगा कि यह संकट सहयोग की ओर मुड़ता है या टकराव की नई इबारत लिखता है।
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