UGC New Rules Protest ने देशभर के कैंपस और राजनीति दोनों को हिला दिया है।
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों को लेकर जनरल कैटेगरी के छात्रों और समाज में उबाल साफ दिखाई दे रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि पहली बार भाजपा और RSS से जुड़े समर्थक भी खुलकर मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक विरोध की आवाज़ें तेज़ हो चुकी हैं।
- UGC New Rules Protest क्या है और सरकार क्या बदलना चाहती है?
- UGC New Rules Protest और नितिन नवीन की पहली बड़ी चुनौती
- UGC New Rules Protest का चुनावी असर: बिहार, यूपी और बंगाल
- UGC New Rules Protest और बिहार की सियासत
- UGC New Rules Protest और उत्तर प्रदेश
- UGC New Rules Protest और पश्चिम बंगाल
- UGC New Rules Protest और हिन्दुत्व की राजनीति पर असर
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भले ही यह भरोसा दिला रहे हों कि किसी के साथ अन्याय या भेदभाव नहीं होगा, लेकिन विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि जो बातें मंत्री कह रहे हैं, उनका ज़िक्र नए नियमों में साफ़ तौर पर नहीं है। यही वजह है कि भरोसे और आश्वासन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसी बीच बिहार और उत्तर प्रदेश में बढ़ते विरोध ने भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कहा जा रहा है कि UGC का नया नियम ही नितिन नवीन की पहली राजनीतिक परीक्षा बन गया है।
UGC New Rules Protest क्या है और सरकार क्या बदलना चाहती है?

UGC ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को अधिसूचित किया, जिसका नाम है ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’। इन नियमों का उद्देश्य कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जाति आधारित भेदभाव को रोकना बताया गया है।
इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में विशेष समितियां, हेल्पलाइन नंबर और मॉनिटरिंग मैकेनिज़्म बनाने के निर्देश दिए गए हैं। ये टीमें मुख्य रूप से SC, ST और OBC छात्रों से जुड़ी शिकायतों की निगरानी करेंगी। सरकार का दावा है कि इससे कैंपस में निष्पक्षता और जवाबदेही बढ़ेगी।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह नियम संतुलित नहीं है और इसमें जनरल कैटेगरी के छात्रों को अप्रत्यक्ष रूप से “स्वाभाविक अपराधी” मान लिया गया है। यही धारणा इस विरोध की सबसे बड़ी वजह बन रही है।
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UGC New Rules Protest: आंकड़े क्या कहते हैं?
UGC के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें बढ़ी हैं।
• 2019-20 में 173 शिकायतें
• 2023-24 में 378 शिकायतें
यानी करीब 118.4% की बढ़ोतरी।
हालांकि AISHE 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 4.33 करोड़ छात्र उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ रहे हैं और शिकायतों की संख्या कुल छात्रों का केवल 0.00087% है। विरोध कर रहे छात्रों का सवाल है कि इतने कम मामलों के आधार पर पूरे सिस्टम को जातीय चश्मे से क्यों देखा जा रहा है।
UGC New Rules Protest और नितिन नवीन की पहली बड़ी चुनौती
बिहार और यूपी में यह मुद्दा सिर्फ छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधा राजनीति से जुड़ गया है। महज सात दिन पहले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने नितिन नवीन के सामने यह पहला बड़ा संकट है।
UGC New Rules Protest और पार्टी समर्थकों की नाराजगी
सबसे बड़ी चिंता यह है कि विरोध करने वालों में बड़ी संख्या भाजपा समर्थकों की है। उत्तर प्रदेश में भाजपा युवा मोर्चा के पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया है। नोएडा और लखनऊ में संगठनात्मक टूट की खबरें सामने आई हैं। कुछ युवाओं ने प्रधानमंत्री मोदी को सोशल मीडिया पर अनफॉलो करने की बात भी कही है।
सीनियर जर्नलिस्ट अजीत भारती और अभिरंजन कुमार जैसे नाम खुलकर इस नियम की आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह नियम भेदभाव कम करने के बजाय और गहरा करेगा।
UGC New Rules Protest का चुनावी असर: बिहार, यूपी और बंगाल
UGC New Rules Protest और बिहार की सियासत
बिहार जातीय गणना 2022 के अनुसार, सवर्ण समाज की आबादी करीब 10.56% है, लेकिन 70 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर उनकी निर्णायक भूमिका है। 2025 विधानसभा चुनाव से पहले यह नाराजगी NDA के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है।
UGC New Rules Protest और उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज लंबे समय से सत्ता परिवर्तन की दिशा तय करता रहा है। पॉलिटिकल एनालिस्ट मानते हैं कि अगर यह असंतोष बढ़ता रहा तो आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है।
UGC New Rules Protest और पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में भाजपा फॉरवर्ड वोटर्स को जोड़ने की कोशिश में थी। लेकिन नए नियम को लेकर बढ़ती नाराजगी से यह रणनीति कमजोर पड़ सकती है। खासकर हिंदी भाषी क्षेत्रों में असर दिखने की आशंका जताई जा रही है।
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UGC New Rules Protest और हिन्दुत्व की राजनीति पर असर
सीनियर जर्नलिस्टों और धार्मिक नेताओं का मानना है कि इस नियम से जातीय पहचान को संस्थागत रूप से मजबूती मिलती है। इससे भाजपा की वह राजनीति कमजोर पड़ सकती है, जो जातियों से ऊपर उठकर हिंदू समाज को एकजुट करने की बात करती रही है।
UGC New Rules Protest और सुधारवादी एजेंडे पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह नियम भाजपा के सुधारवादी एजेंडे को झटका देता है। उनका तर्क है कि कानून ऐसा होना चाहिए जो सभी के लिए समान हो, न कि जाति के आधार पर अलग-अलग।
UGC का नया नियम शिक्षा सुधार से ज्यादा राजनीतिक और सामाजिक बहस का मुद्दा बन चुका है। जनरल कैटेगरी की नाराजगी, विपक्ष का हमला और समर्थकों की असंतुष्टि ने इसे भाजपा के लिए एक संवेदनशील चुनौती बना दिया है। अब सबकी नजर इस पर है कि मोदी सरकार और नितिन नवीन इस विरोध को कैसे संभालते हैं।
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