नए घटनाक्रमों से यूपी की सियासत गर्म

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महेश खरे
(वरिष्ठ पत्रकार)
एक के बाद एक घटनाक्रमों ने देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत को गरमा दिया है। लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस की जोड़ी को मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद वैसे भी यहां सत्ता के समीकरण बनते बिगड़ते रहे हैं। चुनाव अगले साल हैं। लेकिन, हाल ही में बसपा की बहनजी ने ‘अकेले चलो’ का राग अलाप कर सत्ता का सपना बुन रहे दलों में बेचैनी बढ़ा दी है। एसआईआर में बड़ी संख्या में कटे नामों, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच चली बयानबाजी ने भाजपा की चुनावी चिंताएं बढ़ाई हैं। वहीं जाट वोटर छिटकने के बाद सपा के पीडीए में बसपा भी सेंध लगाती दिख रही है। बीते चुनाव में लगभग निष्क्रिय रही बसपा का जाटव वोट सपा-भाजपा के बीच बट गया था। अब माया के नए ऐलान के बाद परिस्थितियों में बदलाव होने की संभावना बन रही है। उधर, ओबैसी बिहार की तरह यूपी में भी मुस्लिम मतदाता को लुभाने की तैयारी में हैं। जेपी नड्डा के बयान के बाद संघ परिवार 2024 में साइलेंट हो गया था। अब संघ प्रमुख मोहन भागवत से योगी की 40 मिनट की बातचीत से स्वयंसेवकों के सक्रिय होने के संकेत मिलने लगे हैं। आइए एक एक करके समझते हैं नए घटनाक्रमों के सियासी मायने।
यूपी में इस बार चुनावी माहौल कुछ ज्यादा जटिल और अंतर्विरोधों से भरा दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति का केंद्र बिंदु हिंदुत्व है। अयोध्या, काशी और मथुरा का नैरेटिव, समान नागरिक संहिता की गूंज, धर्मांतरण और लव जिहाद जैसे मुद्दे पार्टी के कोर वोटर को एकजुट रखने में सहायक रहे हैं। पर सवाल यह है कि क्या 2027 में सिर्फ भावनात्मक लामबंदी ही पर्याप्त होगी?
पिछले कुछ वर्षों में बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे शहरी-ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मुखर हुए हैं। योगी आदित्यनाथ बीजेपी का सबसे बड़ा और प्रभावी चेहरा हैं। कानून व्यवस्था, बुलडोज़र राजनीति और प्रशासनिक सख्ती ने उन्हें एक निर्णायक नेता की छवि दी है। लेकिन यही शैली पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह असहजता भी पैदा करती है।
हाल में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (ज्योतिर्मठ शंकराचार्य) के साथ सार्वजनिक बयानबाजी ने सत्ता और धर्मसत्ता के बीच तनाव बढ़ने का संकेत दिया है। परंपरागत रूप से शंकराचार्य हिंदू समाज की नैतिक-दार्शनिक आवाज माने जाते हैं, जबकि योगी राजनीतिक हिंदुत्व के प्रतीक हैं। यह विवाद हिंदुत्व की एकरूपता के दावे को चुनौती देता है। जहां साधु-संत भी सत्ता की व्याख्या से असहमत दिखते हैं। इसी पृष्ठभूमि में योगी की संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात को सामान्य शिष्टाचार से बढ़कर 2027 के चुनाव की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से बीजेपी का वैचारिक मार्गदर्शक रहा है। संदेश यही है कि पिछले चुनावों से सबक लेते हुए संघ 2027 की चुनौतियों से निपटने और योगी सरकार की हैट्रिक के लिए सक्रिय भूमिका निभाएगा।
मायावती की अकेले दम पर चुनाव लड़ने के फैसले को लेकर भी अटकलबाजियां शुरू हो गई हैं। बसपा के इस फैसले ने यूपी की राजनीति में बड़ी हलचल पैदा कर दी है। यह फैसला सीधे-सीधे विपक्षी एकता को कमजोर करता दिख रहा है। लेकिन, इसके निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं। माया का गणित स्पष्ट है। इसका असर उनके कोर वोट बैंक जाटव समाज समेत दलितों पर एकछत्र दावेदारी के रूप में भी देखा जा रहा है। बुआ-बबुआ जब मिल कर चुनाव लड़े थे तब के नतीजों में माया के फैसले से सेंध लगती नजर आ रही है। सवाल यही है कि अखिलेश के पीडीए में बसपा कितनी हिस्सा बांट करेगी? हालांकि बीते चुनावों में बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है।
लेकिन, यूपी में दलित वोट अभी भी निर्णायक हैं। बसपा यदि 10-12% वोट भी समेट लेती है तो यह सीधा नुकसान सपा और कांग्रेस को होगा। जाटव बनाम गैर-जाटव विभाजन बसपा की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। भाजपा इसमें अपना अप्रत्यक्ष लाभ देख रही है। यूपी की राजनीति जातियों के बिना अधूरी है। गैर यादव ओबीसी अभी भी बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ हैं। इसमें ज्यादातर वह वर्ग है जिसे सरकार के ‘फ्री बीज’ का ‘भरपूर’ लाभ मिल रहा है। फिर भी महंगाई और रोजगार के सवाल ओबीसी वोटर की चिंताएं बढ़ाते नजर आ रहे हैं। इस संदर्भ में सवर्ण समाज की चर्चा भी जरूरी है। यूजीसी के नए नियमों से इस तबके में बेचैनी महसूस की जा रही है। वहीं शंकराचार्य विवाद में भी ब्राम्हण बनाम राजपूत का भाव नजर आ रहा है। यह भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता रहा है।
यूपी में मुस्लिम समुदाय को सपा अपने पीडीए का हिस्सा मानती है। कांग्रेस हालांकि यूपी में बहुत कमजोर है। संगठन के नाम पर बिखराव है। नामचीन चेहरे साथ छोड़ गए हैं अथवा छिटकने की मुद्रा में हैं। इसके बावजूद कांग्रेस की मुस्लिम मतों में पैठ है। बसपा के अकेले चुनाव लड़ने और ओबैसी के मैदान में उतरने की तैयारी से मुस्लिम मतों के बंटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। भाजपा की रणनीति हिंदू एकता के भीतर जातीय असंतोष को ‘शांत’ रखने की है, जबकि विपक्ष जाति-आधारित गोलबंदी को उभारने के प्रयास में है।
सपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती साझा और विश्वसनीय नेतृत्व के साथ वैकल्पिक विकास मॉडल पेश करने की है। मायावती का अलग राह पकड़ना विपक्ष की इस चुनौती को गहराता नजर आ रहा है। यदि विपक्ष सिर्फ भाजपा विरोध तक सीमित रहा तो योगी की मजबूत छवि और हिंदुत्व का भावनात्मक कार्ड तीसरी बार भी भारी पड़ सकता है। कहा जा सकता है कि यूपी विधानसभा चुनाव में आस्था, अस्मिता और जातीय गणित की साझा परीक्षा होगी। इस परीक्षा का परिणाम न सिर्फ लखनऊ, बल्कि दिल्ली की राजनीति पर भी गहरा असर डालेगा।

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