इक्कीसवीं सदी में दुनिया यह मान चुकी थी कि उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद इतिहास की बात हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय क़ानून और बहुपक्षीय संस्थाओं का निर्माण इसी सोच के साथ हुआ था कि अब किसी ताक़तवर देश को कमजोर राष्ट्रों पर हमला करने का अधिकार नहीं होगा। लेकिन Venezuela US Action ने इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया है। वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई केवल एक देश पर हमला नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
Venezuela US Action और 19वीं सदी के साम्राज्यवाद की वापसी
उन्नीसवीं सदी का साम्राज्यवाद केवल जमीन कब्जाने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक वैचारिक अपराध था। उस दौर में ताक़त को नैतिकता का पर्याय बना दिया गया था। साम्राज्यवादी देश खुद को सभ्यता का वाहक बताते थे और इसी नाम पर कमजोर देशों की संप्रभुता, संसाधन और आत्मसम्मान को कुचल दिया जाता था।
Venezuela US Action उसी मानसिकता की आधुनिक पुनरावृत्ति है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब तोपों और बंदूकों के साथ-साथ लोकतंत्र, मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
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Venezuela US Action में ताक़त को क़ानून बना दिया गया
वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप किसी अंतरराष्ट्रीय अदालत की अनुमति से नहीं हुआ। यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के किसी प्रस्ताव पर आधारित नहीं था। इसके बावजूद इसे कार्रवाई कहा गया। यही आधुनिक साम्राज्यवाद की सबसे खतरनाक पहचान है — जहाँ ताक़त ही क़ानून बन जाती है।
संयुक्त राष्ट्र की चुप्पी और अंतरराष्ट्रीय क़ानून की विफलता
संयुक्त राष्ट्र का गठन इसलिए हुआ था ताकि किसी भी देश की संप्रभुता का उल्लंघन न हो। लेकिन Venezuela US Action के दौरान यूएन की भूमिका एक मूक दर्शक से ज्यादा नहीं रही।
यूएन चार्टर का अनुच्छेद 2(4) स्पष्ट रूप से किसी भी प्रकार के सैन्य बल प्रयोग पर रोक लगाता है। अनुच्छेद 2(7) किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को अवैध ठहराता है। इसके बावजूद अमेरिकी कार्रवाई पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
Venezuela US Action ने यूएन की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए
आज संयुक्त राष्ट्र युद्ध रोकने वाली संस्था से ज़्यादा एक बयान जारी करने वाली संस्था बन चुकी है। उल्लंघन पर कार्रवाई की जगह “गहरी चिंता” व्यक्त की जाती है। यह संतुलन नहीं, बल्कि नैतिक पलायन है।
लोकतंत्र और मानवाधिकार का दोहरा चेहरा
आधुनिक साम्राज्यवाद का सबसे खतरनाक पहलू उसका दोहरा नैतिक चरित्र है। लोकतंत्र और मानवाधिकार की बात करते हुए उन्हीं मूल्यों का गला घोंटा जाता है।
यह साफ दिखाता है कि लोकतंत्र का सम्मान केवल तभी किया जाता है जब सत्ता में बैठा नेता महाशक्तियों की नीति के अनुरूप हो। जैसे ही कोई देश स्वतंत्र नीति अपनाता है, उस पर कार्रवाई को जायज़ ठहराया जाने लगता है।
Venezuela US Action सिर्फ वेनेजुएला तक सीमित नहीं
आज वेनेजुएला निशाने पर है, कल कोई और देश होगा। यही इस दौर की सबसे भयावह सच्चाई है। यदि अंतरराष्ट्रीय क़ानून चयनात्मक बनता रहा, तो पूरी वैश्विक व्यवस्था अराजकता की ओर बढ़ेगी।
डोनाल्ड ट्रंप और ‘शक्ति ही अंतिम तर्क’ की राजनीति
डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति कूटनीति से ज्यादा शक्ति-प्रदर्शन पर आधारित रही है। Venezuela US Action इसी सोच का परिणाम है। यह संदेश दिया गया कि किसी क़ानून, किसी संस्था या किसी नैतिक समझौते की परवाह किए बिना कार्रवाई की जा सकती है।
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Venezuela US Action और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का भविष्य
जब महाशक्तियाँ खुलेआम अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अवहेलना करती हैं, तो अन्य देश भी यही रास्ता अपनाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। तब दुनिया अदालतों और संधियों से नहीं, बल्कि धमकियों और सैन्य ताक़त से चलने लगती है।
क्या दुनिया फिर जंगल के क़ानून की ओर बढ़ रही है?
अंतरराष्ट्रीय क़ानून इस विश्वास पर टिका है कि सभी देश समान हैं। लेकिन Venezuela US Action ने यह साफ कर दिया है कि नियम कमजोरों के लिए हैं और अपवाद ताक़तवरों के लिए।
इतिहास गवाही देता है — जब क़ानून मरता है, तब न्याय नहीं बचता, सिर्फ प्रभुत्व बचता है। आज सवाल यह नहीं कि अमेरिका ने क्या किया, असली सवाल यह है कि दुनिया इस पर कितनी देर तक चुप रहेगी।
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