West Bengal Assembly Election 2026 : बंगाल की सत्ता की लड़ाई में ममता बनर्जी बनाम बीजेपी, घुसपैठ, SIR और पहचान की राजनीति से गरमाया चुनावी मैदान

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बंगाल चुनाव 2026 में ममता बनर्जी बनाम बीजेपी
Highlights
  • • बंगाल चुनाव 2026 क्यों है सबसे अहम • SIR और मतदाता सूची विवाद • ममता बनर्जी की रणनीति • बीजेपी का सत्ता परिवर्तन प्लान • चुनाव परिणाम के संभावित समीकरण

पश्चिम बंगाल एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ चुका है। अप्रैल–मई 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं रह गए हैं, बल्कि यह चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक पहचान और मतदाता अधिकारों की कड़ी परीक्षा बन चुके हैं। असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के साथ चुनाव होने के बावजूद सबसे ज्यादा निगाहें बंगाल पर टिकी हैं, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही हैं और भारतीय जनता पार्टी निर्णायक मुकाबले की तैयारी में जुटी है।

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West Bengal Assembly Election 2026 : बंगाल की सत्ता की लड़ाई में ममता बनर्जी बनाम बीजेपी, घुसपैठ, SIR और पहचान की राजनीति से गरमाया चुनावी मैदान 1

क्यों बंगाल बना सबसे बड़ा राजनीतिक रणक्षेत्र

पश्चिम बंगाल लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति को दिशा देने वाला राज्य रहा है। 2011 में वाम मोर्चे के पतन के बाद ममता बनर्जी ने जिस तरह सत्ता संभाली, उसने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 215 सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ता में मजबूत वापसी की थी, जबकि भारतीय जनता पार्टी 77 सीटों तक सीमित रह गई थी।

अब 2026 में समीकरण बदले हुए नजर आ रहे हैं। मतदाता सूची, प्रशासनिक टकराव, पहचान की राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे बंगाल चुनाव को सामान्य राज्य चुनाव से कहीं आगे ले जा चुके हैं।

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मतदाता सूची और SIR बना सबसे बड़ा विवाद

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चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया ने बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की व्यापक जांच हो रही है, जिससे हजारों नाम जोड़े और हटाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर तीखा विरोध जताते हुए आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया खास समुदायों और कमजोर वर्गों को वोटिंग से बाहर करने की साजिश है।

तृणमूल कांग्रेस ने इसे जन आंदोलन का रूप देने की कोशिश की, रैलियां निकालीं और चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगाए। दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि फर्जी और अवैध मतदाताओं को हटाना लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम है।

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प्रशासनिक दबाव और बढ़ता चुनावी तनाव

मतदाता सूची विवाद का असर प्रशासन तक साफ दिखाई देने लगा है। कई जिलों में बूथ स्तर अधिकारी मानसिक दबाव की बात कह रहे हैं। मुर्शिदाबाद जैसे संवेदनशील इलाकों में विरोध प्रदर्शन और सरकारी कार्यालयों में तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई हैं।

इसके साथ ही 31 जनवरी 2026 को राज्य के पुलिस महानिदेशक का सेवानिवृत्त होना भी चुनावी माहौल को प्रभावित करने वाला कारक माना जा रहा है। नए डीजीपी की नियुक्ति कानून-व्यवस्था और चुनाव निष्पक्षता पर बड़ा असर डाल सकती है।

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ममता बनर्जी की रणनीति: अस्मिता और पहचान की राजनीति

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तृणमूल कांग्रेस की राजनीति इस बार बंगाली अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय गौरव के इर्द-गिर्द घूम रही है। ममता बनर्जी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि बाहरी ताकतें बंगाल की संस्कृति और परंपराओं को कमजोर करना चाहती हैं।

अल्पसंख्यक, ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों के मतदाताओं को एकजुट रखना टीएमसी की प्राथमिक रणनीति है। मतुआ समुदाय और सीमावर्ती क्षेत्रों में बदले रुझान ममता के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।

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बीजेपी का प्लान: संगठन, सुरक्षा और स्वच्छ चुनाव

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भारतीय जनता पार्टी इस बार संगठन विस्तार, मजबूत केंद्रीय नेतृत्व और स्वच्छ मतदाता सूची को अपने अभियान का मुख्य आधार बना रही है। पार्टी का दावा है कि लंबे समय से अवैध मतदाता टीएमसी की जीत की नींव रहे हैं और अब यह स्थिति बदलने वाली है।

राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठ और शासन सुधार जैसे मुद्दों को स्थानीय राजनीति से जोड़कर भाजपा व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश में है।

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नतीजा क्या होगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि तृणमूल कांग्रेस अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखने में सफल रहती है, तो सत्ता बरकरार रह सकती है। वहीं यदि भाजपा संगठनात्मक मजबूती और मतदाता सूची विवाद को अपने पक्ष में भुना लेती है, तो सत्ता परिवर्तन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह चुनाव सिर्फ सरकार बनाने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भरोसे और निष्पक्षता की कसौटी बन चुका है।

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