पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले राज्य की राजनीति एक बार फिर टकराव के चरम पर पहुंच गई है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और केंद्र की सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी के बीच संघर्ष अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक एजेंसियों, अदालतों और सड़कों तक फैल चुका है। प्रवर्तन निदेशालय और तृणमूल कांग्रेस के बीच छिड़ा ताजा विवाद इस संघर्ष को और तीखा बना रहा है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा ईडी की कार्रवाई पर खुला विरोध, कोलकाता पुलिस के मामले और अदालत में दायर याचिकाएं यह संकेत देती हैं कि आने वाले चुनाव केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बनने जा रहे हैं।
West Bengal Assembly Election 2026 TMC ED Controversy और आई-पैक छापों की सियासी टाइमिंग
जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में कोलकाता और दिल्ली में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से जुड़ी कंपनी आई-पैक के ठिकानों पर ईडी की छापेमारी ने बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया। यह छापे कोयला तस्करी से जुड़े पुराने मामलों से जोड़े गए, लेकिन चुनाव से ठीक पहले हुई इस कार्रवाई ने कई सवाल खड़े कर दिए।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का खुद छापे वाली जगह पर पहुंचना और दस्तावेजों को सुरक्षित करना, तृणमूल कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संदेश बन गया। पार्टी ने इसे लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर हमला बताते हुए केंद्र सरकार पर सीधा आरोप लगाया।
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West Bengal Assembly Election 2026 TMC ED Controversy में कोर्ट और पुलिस की एंट्री
ईडी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि जांच में बाधा डाली गई, जबकि दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने केंद्रीय एजेंसी पर चुनावी डेटा चोरी का आरोप लगाते हुए कानूनी कदम उठाया। कोलकाता पुलिस द्वारा ईडी के खिलाफ दर्ज मामलों ने इस टकराव को अभूतपूर्व बना दिया है।
यह स्थिति केवल कानूनी विवाद नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य के बीच शक्ति संतुलन की खुली जंग बन चुकी है।
West Bengal Assembly Election 2026 TMC ED Controversy से टीएमसी को कैसे मिल रहा है राजनीतिक लाभ?
इस पूरे घटनाक्रम से ममता बनर्जी की ‘संघर्षरत नेता’ की छवि और मजबूत होती दिख रही है। तृणमूल कांग्रेस इसे केंद्र की साजिश बताकर अपने कोर वोट बैंक को एकजुट करने में जुटी है। मुस्लिम और दलित समुदाय में यह संदेश दिया जा रहा है कि राज्य की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश हो रही है।
नई दिल्ली में टीएमसी सांसदों का प्रदर्शन और इंडिया गठबंधन के समर्थन ने पार्टी को नैतिक ताकत दी है। माना जा रहा है कि इस नैरेटिव से पार्टी 5 से 10 सीटों पर नुकसान टाल सकती है।
West Bengal Assembly Election 2026 TMC ED Controversy और शहरी मतदाताओं की चुनौती
हालांकि, लगातार भ्रष्टाचार के आरोपों की पुनरावृत्ति से शहरी और मध्यम वर्ग में असंतोष भी बढ़ सकता है। स्कूल भर्ती, राशन और कोयला मामलों की यादें फिर से उभर रही हैं, जिससे टीएमसी की छवि को नुकसान पहुंचने का खतरा बना हुआ है।
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West Bengal Assembly Election 2026 TMC ED Controversy से भाजपा को कितना फायदा?
भाजपा इस पूरे विवाद को ‘भ्रष्टाचार बनाम विकास’ के फ्रेम में पेश कर रही है। यदि अदालत से ईडी को समर्थन मिलता है और ठोस सबूत सामने आते हैं, तो भाजपा को नैतिक बढ़त मिल सकती है। इससे 10 से 15 सीटों पर सीधा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह खुद को बदलाव की ताकत के रूप में पेश करे, लेकिन जोखिम भी उतना ही बड़ा है। एजेंसी के दुरुपयोग का आरोप यदि जनता में मजबूत हुआ, तो इसका उलटा असर भी हो सकता है।
West Bengal Assembly Election 2026 TMC ED Controversy और सीमित लेकिन निर्णायक सीटें
विशेषज्ञों के अनुसार यह विवाद कुल 294 सीटों में से लगभग 20 से 30 सीटों को सीधे प्रभावित कर सकता है। खासकर वे सीटें जहां पिछले चुनाव में जीत-हार का अंतर 5,000 से कम था। दक्षिण बंगाल, उत्तर 24 परगना, हुगली-हावड़ा और उत्तर बंगाल के कुछ क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील माने जा रहे हैं।
यह साफ है कि टीएमसी-ईडी विवाद पश्चिम बंगाल चुनाव का अकेला मुद्दा नहीं बनेगा, लेकिन यह चुनावी माहौल को तेज और ध्रुवीकृत जरूर करेगा। ममता बनर्जी के लिए यह सहानुभूति और संघर्ष की राजनीति का अवसर है, जबकि भाजपा के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रामक अभियान का मंच। अंतिम फैसला अदालतों से लेकर मतपेटियों तक होगा।
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