शम्भूनाथ शुक्ल
(वरिष्ठ पत्रकार )
बॉलीवुड को कम्युनल बताने वाले संगीतकार अल्ला रक्ख़ा रहमान यह बात भूल जाते हैं कि फ़िल्म इंडस्ट्री में किसी कलाकार या गीतकार अथवा संगीतकार की जाति या धर्म नहीं देखा जाता बल्कि आज की ज़रूरतों और मांग के अनुरूप उसका परफ़ॉरमेंस देखा जाता है। साथ ही जो क़ीमत वह मांग रहा है, उसे देने की औक़ात भी तो प्रोड्यूसर की होनी चाहिए। एआर रहमान आज के सबसे महंगे संगीतकार हैं और ऊपर से वे मुंबई नहीं चेन्नई में रहते हैं।
बार-बार चेन्नई जाना हर प्रोड्यूसर के वश की बात नहीं। फिर रहमान सभी को भी समय भी नहीं देते। 14 जनवरी को बीबीसी के मंच पर दिये अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कह दिया कि पिछले आठ सालों से उन्हें बॉलीवुड में काम नहीं मिल रहा, शायद इसका कारण कम्यूनल हो। उनके इस बयान से बॉलीवुड में बवाल खड़ा हो गया है।
भारत का सबसे चर्चित और सबसे महंगा संगीतकार यदि इस तरह की बात करता है तो हंगामा होना स्वाभाविक है। हर किसी को लगने लगता है कि कोई मुस्लिम सेलिब्रिटी जब आउट डेटेड होने लगती है तब वह विक्टिम कार्ड का पत्ता चल देता है। क्यों वह यह रोना रोता है कि उसके साथ ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि वह मुसलमान है ? क्रिकेट स्टार अज़हरुद्दीन जब मैच फ़िक्सिंग में फंसे तो फ़ौरन उन्होंने ताना मारा कि उन्हें मुसलमान होने के कारण लपेटा जा रहा है। नसीरुद्दीन शाह और आमिर ख़ान की हिंदू पत्नी किरण राव ने भी आज के दौर को कम्युनल बता दिया था। बाद में जब पारस्परिक तनातनी में आमिर ने उन्हें तलाक़ दे दिया तो उन्हें यह समाज कम्युनल नहीं प्रतीत हुआ। यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं है। ये सब सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचे हुए लोग हैं। पर जब भी ये ढलान पर होते हैं, फ़ौरन यह रोना रोने लगते हैं।
इन लोगों की ऐसी हरकतों के कारण पूरी मुसलमान क़ौम बदनाम होती है। जिस शो बिजिनेस में एआर रहमान हैं, वहाँ प्रतिभा की ही पूछ होती है। उम्र ढलने के साथ परफ़ॉरमेंस में धीमापन आता है और कलाकार की त्वरा समाप्त होने लगती है। मगर कलाकार चाहता है, सदैव वह ही शिखर पर रहे। अरे भाई नई पीढ़ी आ रही है, उसे रास्ता दो। यह सच है कलाकार की कला में भी निखार आता है परंतु बाज़ार की डिमांड बदलती रहती है और टॉप का कलाकार भी पिछड़ने लगता है। बॉलीवुड में आज न तो अमिताभ बच्चन की पहले जैसी मांग है न शाहरुख़ ख़ान की, लेकिन इन लोगों ने यह रोना नहीं रोया कि उन्हें किसी जाति विशेष का होने अथवा एक ख़ास मज़हब का होने के कारण निर्माता-निर्देशक काम नहीं दे रहे। इन्होंने अपने सम्मान को बनाए रखा और काम की दौड़ में नहीं भागे। शाहरुख़ ख़ान अब हीरो बन कर भले न आएँ किंतु किंग ख़ान का रुतबा बरकरार है।
एआर रहमान यह भी भूल जाते हैं कि पिछले साल की सबसे चर्चित और कमाई करने वाली फ़िल्म धुरंधर के गीत इरशाद कामिल ने लिखे हैं। 2025 की फ़िल्म छावा जो मराठा योद्धा संभाजी महाराज पर बनी है और जिसका युद्ध औरंगज़ेब से हुआ, को कट्टर हिंदुत्त्व वाली फ़िल्म बताया गया है। रहमान उसे भी कम्युनल बता रहे हैं, पर उसका तो संगीत एआर रहमान ने स्वयं दिया। इसके भी गीत इरशाद कामिल ने लिखे हैं। इम्तियाज़ अली की 2024 में आई फ़िल्म अमर सिंह चमकीला को संगीत एआर रहमान ने दिया। द डिप्लोमैट, उफ़्फ़ ये सियापा और तेरे इश्क़ में के गाने उन्होंने कम्पोज़ किए हैं। फिर वे कैसे कह रहे हैं, उन्हें काम नहीं मिल रहा ?
इसमें कोई शक नहीं कि पिछले एक डेढ़ दशक से समाज में हिंदू-मुसलमान बहुत होने लगा है। हमारा समाज कम्युनल आधार पर विभाजित भी हुआ है। लेकिन शिखर पर बैठे लोगों या ज़मीनी स्तर पर काम करने वालों का विभाजन इस तरह नहीं होता क्योंकि सांप्रदायिकता और सेकुलरिज्म मध्य वर्ग के ईगो हैं। इनके लपेटे में कभी भी टॉप पर बैठे लोग नहीं आते न ज़मीन के लोग। अज़ीम प्रेम जी जैसे उद्योगपति निरंतर तरक़्क़ी कर रहे हैं। और वे अकेले नहीं देश के लाखों मुस्लिम उद्यमी नई-नई ऊंचाइयां छू रहे हैं। अभी इंडिगो संकट के बाद जिन तीन एयर लाइन कंपनियों को जहाज़ उड़ाने की अनुमति मिली है, उनमें से एक अल हिंद एयर लाइन है, जो केरल के एक मुस्लिम उद्यमी की है। लखनऊ के लू लू माल के मालिक भी मुसलमान हैं। ऐसे असंख्य मुसलमान देश में मज़े से व्यापार कर रहे हैं। किसी भी मुस्लिम कारीगर को काम की कमी नहीं है।
बॉलीवुड में दर्जनों कलाकार मुस्लिम हैं। ख़ासकर हीरो का या फ़िल्मों में अहम किरदार निभाने वाले मुस्लिम हैं, आज तक किसी ने नहीं कहा कि मुसलमान होने के कारण उन्हें काम नहीं मिल रहा। नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी, अरशद वारसी आज भी हिंदी सिनेमा में अहम रोल में आते हैं। शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान और आमिर ख़ान तो पिछले तीन दशकों से हिंदी सिनेमा के पर्याय रहे। इनके पहले के कलाकारों में भी फ़िरोज़ ख़ान, संजय ख़ान, अमजद ख़ान हर सिनेमा दर्शक के लाडले थे। महमूद को भला किसने नहीं पसंद किया। सबसे बड़ी बात कि हिंदी सिनेमा को विश्व मंच पर लाने वाली तिकड़ी- दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद में से दिलीप कुमार का असली नाम यूसुफ़ ख़ान था। परदे पर भले उन्हें दिलीप कुमार बताया गया पर पूरे मुंबई फ़िल्म उद्योग के लोग उन्हें यूसुफ़ साहब ही कहते थे। वे भी खुद को यूसुफ़ कहलाना पसंद करते थे।
हमारा बॉलीवुड इस मामले में अव्वल रहा कि कभी भी वहां सांप्रदायिकता की बू नहीं आई। कबीर ख़ान द्वारा निर्देशित बजरंगी भाईजान को भला कौन भूल सकता है। संगीतकारों में ख़य्याम और नौशाद साहब की क़द्र सदैव रही। तबला वादक उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ख़ान, शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान को तो भारत रत्न मिला, वह भी अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के समय। उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान की वीणा देश में कभी विस्मृत नहीं की गई, वह आज भी झंकृत हो रही है। पंडित रवि शंकर उन्हीं के शिष्य थे। संगीत का और संगीतकार का कोई मज़हब नहीं होता । उसका ख़ुदा संगीत है। फ़िल्म रोज़ा से हिट होने वाले एआर रहमान भूल गए कि उनको 2002, 2003, 2018 और 2024 में संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार एनडीए शासन के समय मिले। 2018 में उन्हें दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
सच तो यह है कि अहंकारी और आत्म मुग्ध व्यक्ति खुद को पीड़ित बता कर दूसरों का ध्यान अपनी तरफ़ आकृष्ट करने की कोशिश करता है। एआर रहमान की इस कोशिश ने उनकी प्रतिभा को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। उनके बयान से देश की सेकुलर जमात भी खिन्न है। सोशल मीडिया पर आज वे अपनी इस हरकत से ट्रोल हो रहे हैं। देश के तमाम मुसलमान भी उनके इस बयान को लेकर पशोपेश में हैं। वे खुल कर सामने नहीं आ रहे किंतु अंदर से उन्हें भी निराशा हुई है। क्योंकि इस बयान से पूरी मुस्लिम कम्युनिटी बदनाम हो रही है। फ़िल्मी दुनिया की चर्चित स्तंभकार शोभा डे जैसी हस्तियों ने भी एक्स पर रहमान को आड़े हाथों लिया है। कभी भी बॉलीवुड में सांप्रदायिकता ने प्रवेश नहीं किया। अगर किसी ने कोई अनर्गल टिप्पणी की तो फ़ौरन उसे बाहर किया गया। आज कंगना रनौत भले लोकसभा में पहुंच गई हों किंतु बॉलीवुड में उनकी प्रतिष्ठा ख़त्म हो गई।
यही कारण है कि फ़िल्म जगत में भी उनके इस बयान पर आक्रोश है। ज़ावेद अख़्तर ने कहा है कि उन्हें काम मिलना बंद हो गया है, इसमें सांप्रदायिक कोण कहां है? गीतकार शान ने कहा है कि हिंदी सिनेमा में कभी भी कोई कम्युनल नज़रिए से कलाकार को नहीं देखा गया। कंगना रनौत ने तो यह भी दावा किया है कि मैं एआर रहमान से अपनी फ़िल्म इमरजेंसी के लिए म्यूज़िक दिलवाना चाहती थी पर मेरे भगवा पार्टी (भाजपा) में होने के कारण उन्होंने मेरी कहानी सुनने से इनकार कर दिया। तस्लीमा नासरीन ने एक्स पर लिखा है, कि एआर रहमान गलत-बयानी कर रहे हैं। उन्हें भारत में खूब नाम और काम मिला है। वे सबसे महंगे संगीतकार हैं।
तस्लीमा ने कहा है कि अमीर लोगों को कभी भी सांप्रदायिकता का शिकार नहीं होना पड़ता। उसके निशाने पर आम लोग आते हैं। ट्रोल होने के चलते बाद में रहमान ने सफ़ाई दी कि उनके बयान को गलत तरीक़े से लिया गया। वे काम की कमी के बाबत बात कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत तो उनका घर है। उन्हें ख़ुशी है कि वे एक ऐसे देश में रह रहे हैं जो बहुलतावादी है और तमाम संस्कृतियां यहां फलती-फूलती हैं। बॉलीवुड में मशहूर स्टोरी राइटर उमा शंकर सिंह का कहना है कि बॉलीवुड में कभी भी किसी का धर्म या जाति नहीं देखी गई। नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी और हुमा क़ुरैशी को हिंदी फ़िल्मों में हाथों-हाथ लिया जाता है। इसलिए रहमान का आरोप सर्वथा ग़लत है। एआर रहमान यह नहीं स्पष्ट कर पा रहे कि उनके पास काम की कमी उनके अपने एटीट्यूड के कारण है। उनके रेट बहुत अधिक हैं, दूसरे वे यह भी भूल जाते हैं कि आज की पीढ़ी को नया संगीत पसंद है। वे एक पीढ़ी पुराने संगीतकार हैं।
मज़े की बात कि एआर रहमान एक हिंदू परिवार में जन्मे, उनका नाम शेखर दिलीप कुमार था। 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने एक सूफ़ी के प्रभाव में मुस्लिम धर्म अपना लिया। उनके पिता की बीमारी में उस सूफ़ी संत की संगत से काफ़ी सहारा मिला था। उनके पिता को कैंसर की असाध्य बीमारी थी। उनके पिता हालांकि जीवित बचे नहीं। इस तरह के लोगों को धर्म जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बोलने से पहले खूब सोच-विचार करना चाहिए। धर्म का फलक बहुत बड़ा होता है। उसका सरलीकरण करने से कई तरह की भ्रांतियां फैलती हैं। जाने-अनजाने में अल्लारक्खा रहमान पूरे एक समुदाय को कटघरे में खड़ा कर गये। वे एक सफल संगीतकार हैं, उन्हें संगीत पर बोलना चाहिए। एक राजनीतिक की तरह की उनकी बयानबाज़ी से मुस्लिम समाज को धक्का लगा है। अल्लारक्ख़ा की छवि कोई वितंडा खड़ा करने की नहीं रही है।
भारत में हिंदुओं ने कभी भी मां तुझे सलाम! जैसे गीत पर कोई सांप्रदायिक नज़रिया नहीं अपनाया। वे कह सकते थे कि देश के बहुसंख्यक हिंदुओं, सिखों, जैनियों, बौद्धों और यहाँ तक कि ईसाइयों व पारसियों में भी मां को सलाम करने का रिवाज़ नहीं रहा है। मां को प्रणाम ही किया जाता है किंतु चूंकि कुछ कट्टर मुसलमानों का कहना है कि वे किसी को भी प्रणाम या वन्दे नहीं करेंगे इसलिए सलाम ही चलेगा , और हिंदुओं ने उनके विचारों तथा उनके मज़हब का सम्मान किया। इसे मुद्दा नहीं बनाया। अब उन्हें सांप्रदायिक बता कर किस तरह की धर्म निरपेक्षता को लाने के इच्छुक हो श्रीमान अल्लारक्खा रहमान!
मांग घटी तो तो रहमान ने चला विक्टिम का पत्ता