रिश्तों की डोर क्यों इतनी कमजोर?

By Team Live Bihar 69 Views
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महेश खरे (वरिष्ठ पत्रकार)
पिता के हाथों जवान बेटी की हत्या की खबर मन को झकझोरती है। भला एक पिता अपनी बेटी की हत्या कैसे कर सकता है? बचपन में जिसे गोदी में खिलाया हो… लोरियां सुनाई हों उस बेटी को गोली मारने में हाथ तो कांपे ही होंगे? यह ऐसी अनहोनी है जिस पर आसानी से भरोसा नहीं होता। वह भी गुरुग्राम जैसे हाई-टेक और आधुनिक शहर में? ऐसी दर्दनाक खबर सुनकर इंद्र देव भी शायद अपने आंसुओं को रोक नहीं सके। बादल इस कदर बरसे कि पूरा गुरुग्राम शहर पानी-पानी हो गया।
बेटी को पढ़ाया-लिखाया और योग्य इसलिए बनाया जाता है कि वह परिवार का नाम रौशन करे। फिर यह बेटी तो टेनिस की काबिल खिलाड़ी थी। स्टेट लेबल तक खेलने का रिकॉर्ड भी बना चुकी थी। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उनकी अपनी एक अलग दुनिया आकार ले लेती है। मित्र मंडली बन जाती है। जो नाम कमा लेते हैं उनके तो प्रशंसकों की संख्या भी अच्छी खासी हो जाती है। ऐसी परिस्थिति और मोबाइल युग में परिवार के बड़ों को तब अपना नजरिया व्यापक बनाकर चलना पड़ता है। आज के परिवारों में तालमेल बनाकर तो सभी को चलना जरूरी हो गया है। माता-पिता को शुरुआती दौर में ही बच्चे का लालन-पालन उसी प्रकार करना चाहिए जैसा वो उसे बनाना चाहते हैं।
बड़े होने पर अपने हिसाब से चलने का दवाब बनाना कभी-कभी बड़ी समस्या को जन्म देता है। दरअसल इसके पीछे हमारे समाज की दकियानूसी सोच भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। बेटों को तो आगे बढ़ा कर माता-पिता और परिजन गर्व का अनुभव करते हैं। लेकिन जब बेटी ‘नेम और फेम’ अर्जित करने लगती है तो परिवार के ही सदस्यों का भाव बदल जाता है। इस दर्दनाक कहानी में भी कुछ ऐसा ही बताया जा रहा है। पिता ने बेटी के नाम से टेनिस अकादमी खुलवा दी तो समाज के ताने सुनने को मिलने लगे। बेटी की कमाई पर निर्भर होने के ताने? इस सोच सोच से कब उबरेगा हमारा समाज? माता- पिता बेटे की कमाई पर जी सकते हैं लेकिन बेटी परिवार चलाने लगे तो घर बाहर नुक्ताचीनी होने लगती है। दुनिया कहीं की कहीं पहुंच गई और हम दकियानूसी ख्यालों के अंधेरे में ही भटक रहे हैं? फिर हरियाणा तो उन राज्यों में शुमार है जहां खाप पंचायतों के फरमानों और परिवार की झूठी आन, बान और शान के नाम पर बहे खून के दाग़ अभी तक मिट नहीं पाए हैं।
चिंता की बात तो मोबाइल को लेकर है। यह समस्या एक घर की नहीं, पूरे समाज और देश की है। रील का चस्का ऐसा लगा है कि जो इससे बच गया उसे भाग्यवान समझा जाना चाहिए। अनेक ऐसे मामले हमारे सामने आए दिन आते रहते हैं। ऐसी घटनाएं, जिनमें रील बनाने के चक्कर में बच्चे क्या बूढ़े तक अपनी जान जोखिम में डालने से नहीं घबराते। कई बार तो जान बच भी नहीं पाती। यह अभी तक एक लाइलाज समस्या है जिसका इलाज समाज को ढूंढ़ना है। सस्ता और अनलिमिटेड डाटा (नेट) इस समस्या को बढ़ा ही रहा है। जब तक डाटा महंगा था तब तक इसके खर्च होने की चिंता रहती थी। अब तो ‘अनलिमिटेड चंदन घिस मेरे नंदन’ हो रहा है। जिसे देखो वही मोबाइल से चिपका पड़ा है। फिर डाटा का सदुपयोग होने के बजाय ज्यादातर तो इसका दुरुपयोग ही हो रहा है। अगर मोबाइल या कम्प्यूटर के डाटा का सही उपयोग किया जाए तो यह बड़े काम की चीज है।
बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई और बड़ों के कार्यालयीन काम-काज में डाटा की उपयोगिता कोविड काल में साबित हो चुकी है। विदेशों की तरह भारत में भी अब ‘वर्क फ्रॉम होम’ का चलन बढ़ता जा रहा है। इस नियम से चलने वाले दफ्तरों का जहां खर्च काफी कम हो जाता है वहीं कर्मचारियों के घर से कार्यालय तक आने जाने का खर्च और समय भी बचता है। कामकाजी माहौल जहां ‘वर्क फ्रॉम होम’ से सस्ता और सुविधाजनक हो रहा है वहीं दिन रात की चैटिंग का पारिवारिक रिश्तों पर विपरीत असर पड़ रहा है। अगर यह कहा जाए कि मोबाइल में उलझे परिवार के लोग आपस में बात करना भी भूल गए हैं तो ग़लत या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा।
वैसे भी आधुनिकता की दौड़ में शामिल समाज से परिवार नाम की संस्था सिकुड़ कर पति-पत्नी और बच्चे तक सीमित रह गई है। दादा-दादी से बच्चे अनजान और बेखबर होते जा रहे हैं। एक जमाना था जब बच्चे नाना-नानी के घर छुट्टियां बिताने जाते थे। आज अगर जाते भी हैं तो वहां अधिकांश समय मोबाइल में ही उलझे रहते हैं। वापसी का समय आ जाता है लेकिन ढंग से एक दूसरे के सुख-दुख बांटने का समय ही कहां मिल पाता है? पारिवारिक विघटन को रोकने की जिम्मेदारी आखिर है किसकी ? उत्तर एक ही है। और वह है घर के बड़ों की। माता-पिता की। पहले जमाने में तो चाचा-चाची भी जिम्मेदारी ओढ़ लेते थे। अब वह सोच भी बेमानी हो गई है।
बचपन में बच्चों के मोबाइल-प्रेम पर तालियां पीटने वाले माता-पिता बड़े होने पर बेटा-बेटी को कैसे मोबाइल से दूर रख सकते हैं? हां, जो माता पिता शुरू से नियंत्रण रखते हैं उनके लिए जरूर बच्चों को मोबाइल से दूर रखना कुछ आसान होता है। इसीलिए जिस राह पर बच्चों को ले जाना है उसकी लकीरें शैशव काल में ही उकेरनी होंगी। गुरुग्राम जैसी घटनाओं के लिए हमारी कूप मंडूक सोच और अधकचरी जीवन-शैली को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आज का समय ऐसा है कि अगर शुरू से ही नजर ना रखी जाए तो बालपन में ही संतान वह सब जान जाती है जिसे उसको जवान होकर जानना चाहिए। अधपकी उम्र में मिली ये जानकारियां भटकने का रास्ता बनाती हैं। तब पछताने अथवा समाज को दोष देने के अलावा और किया ही क्या जा सकता है? परिवार में आपसी क्लेश का एक बड़ा कारण हमारी असावधानी और नासमझी भी है।

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