क्या वंशवादी लोकतंत्र की राह चलेंगे निशांत कुमार

By Team Live Bihar 41 Views
8 Min Read

कमलेश पांडेय (वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक )
वंशवादी लोकतंत्र का क्रांतिकारी भूमि बिहार में अपनी गहरी जड़ें जमाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है! यह लोकतंत्र की जननी वैशाली की मूल भावनाओं को मुंह चिढ़ाने जैसा है। ऐसा इसलिए कि सूबाई राजनीति को विगत 4 दशकों तक प्रभावित करते रहने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, और लोजपा आलाकमान रहे स्व. रामविलास पासवान ने अपने-अपने लाडले क्रमशः तेजस्वी यादव और चिराग पासवान को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप चुके हैं। लगता है बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू प्रमुख नीतीश कुमार भी अब इसी राह पर चलने की तैयारी में हैं।
इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही देरी से फैसला किया हो, लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद की भांति वो निशांत कुमार के लिए अपने समर्थकों से मजबूत फील्डिंग भी करवा रहे हैं। इससे प्रदेश की राजनीति में कई सवाल पैदा हो रहे हैं, क्योंकि चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, एक दूसरे को शिकस्त देने के लिए इन क्षेत्रीय राजनीतिक सूबेदारों को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस की राह पर भाजपा का चलना देश की वैचारिक राजनीति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, जबकि भाजपा को इतनी ऊंचाई देने वाली टीम का मानना है कि चूंकि लोहा ही लोहे को काटता है, इसलिए कांग्रेस मुक्त भारत के लिए वो लोग जैसे को तैसा वाली राजनीति देंगे।
भाजपा की इसी सोच का फायदा उठाते हुए उसके दो बड़े कद्दावर नेताओं यानी पार्टी में नम्बर 2 की हैसियत रखने वाले अमित शाह और नम्बर 3 की हैसियत वाले राजनाथ सिंह भी अपने पुत्रों क्रमशः जय शाह और पंकज सिंह-नीरज सिंह को महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचा चुके हैं। यदि देखा जाए तो कांग्रेस और भाजपा के अलावा जितने भी यूपीए या एनडीए समर्थक क्षेत्रीय दल हैं, वो भी अपने अपने पुत्रों को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप चुके हैं या ऐसी तैयारी में हैं।
कहा जा सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र को हमारे नेताओं ने वंशानुगत राजतंत्र की तरह ही वंशानुगत लोकतंत्र में तब्दील कर दिया है। कुछ कसर है तो वो गुजरते दशक दशक में पूरी हो जाएगी। इसका कारण प्रतिभाशाली डीएनए है या पूंजीवादी षड्यंत्र, यह आपको बाद में पता चलेगा। क्योंकि यूपी के समाजवादी पार्टी प्रमुख रहे स्व. मुलायम सिंह यादव अपनी सत्ता अपने जीवनकाल में ही अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप चुके थे। महाराष्ट्र के शिवसेना प्रमुख रहे स्व. बाला साहेब ठाकरे अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र उद्धव भाऊ ठाकरे सौंप चुके हैं। इसकी फेहरिस्त बड़ी लंबी है।
इसके पीछे अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जब नौकरशाह का बेटा नौकरशाह, न्यायाधीश का पुत्र न्यायाधीश, उद्यमी का बेटा उद्यमी बन सकता है तो किसी राजनेता का बेटा राजनेता क्यों नहीं बन सकता है ! बात में तो दम है, लेकिन भारतीय संविधान भी इस विषय में मौन है! इससे साफ है कि सत्ता की एक अलग सोच होती है जो राजतंत्र, लोकतंत्र और तानाशाही में भी लगभग एक समान होती है। यह सोच है वंशवादी सोच, जहां राजा या नेता खुद को महफूज समझता है।
यदि आप आजादी के आंदोलनों, संपूर्ण क्रांति और अन्ना हजारे के आंदोलनों पर गौर करेंगे तो यह साफ पता चलेगा कि इन सबका कुछ अघोषित एजेंडा रहा है, जिसमें व्यक्तिवाद, सम्पर्कवाद और वंशवाद सर्वोपरि है। कहीं यह साफ दिखता है तो कहीं पर यह घुमाफिरा कर, लेकिन मूल मर्म यही कि सत्ता बड़ी बेवफा होती है, इसलिए चाहे जैसे भी हो इसे अपने परिवार के खूंटे से बांधे रहो। नेहरू-गांधी परिवार, संघ परिवार और क्षेत्रीय जातीय राजनीतिक परिवारों की सफलता-विफलता का कारण भी यही है।
हैरत की बात तो यह है कि जो समाजवादी-राष्ट्रवादी 1970-80-90 के दशक तक नेहरू-गांधी परिवार के वंशवाद का विरोध कर रहे थे, और ‘तख्त बदल दो ताज बदल दो, वंशवाद का राज बदल दो’ जैसे नारे लगा रहे थे, उन्होंने कैसा क्षेत्रीय वंशवाद चलाया, अब जगजाहिर है। इनमें सबसे धैर्यशाली निकले बिहार के कद्दावर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी जब अपने बेटे निशांत कुमार को सियासत में उतारने की हरी झंडी दे दी और उनके संग गुलदस्ता वाली फोटो वायरल करवा दिया, तो लोगों के दिलोदिमाग में इस वंशवादी लोकतंत्र को लेकर कई सवाल पैदा हो रहे हैं।
पहला सवाल यह कि क्या पारिवारिक लोकतंत्र से आम भारतीयों का भला हो पाएगा? दूसरा सवाल यह कि, जो लोग हर बात में ब्राह्मणों या सवर्णों को कोस रहे थे, उन्होंने सत्ताधीश बनने के बाद कैसा आचरण प्रस्तुत किया? तीसरा सवाल यह कि, वंशवादी नेताओं ने अकूत सम्पत्ति जमा करते हुए हमारे देश की राष्ट्रीय सम्पदाओं को निजी हाथों में सौंपते जा रहे हैं और कोई राजनीतिक चहलकदमी नहीं दिखाई-सुनाई पड़ रही है, क्या इससे आम आदमी का भला होगा? चौथा सवाल यह है कि आरक्षण और सामाजिक न्याय, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद, क्षेत्रीयता बनाम राष्ट्रीयता का हश्र आने वाले दिनों में क्या होगा।
यह सवाल इसलिए कि जब तपे-तपाए नेताओं की जगह उनके अनुभवहीन पुत्र ले लेते हैं तो सिस्टम वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाता है, जैसा कि उससे उम्मीद किसी भी सभ्य समाज को होती है। इससे पार्टी और नेता, दोनों कमजोर होते हैं। चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ , महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इन्होने वंशवादी किले को जमींदोज कर खुद सत्ता सैम,सम्हाली। ऐसे में बिहार में पूर्व मंत्री शकुनि चौधरी के पुत्र और मौजूदा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (कुशवाहा जाति) की सियासी धार को कुंद करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार (कुर्मी जाति) की जो सियासी लॉन्चिंग हो रही है, उससे लवकुश समाज की राजनीति कितनी मजबूत होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन जब उम्र गत कारणों से नीतीश कुमार राजनीति से अवकाश लेने के मुहाने पर खड़े हैं। ऐसे में उन्होंने अपने पुत्र की सियासी लॉन्चिंग कराकर यह संदेश दिया है कि भाजपा और कांग्रेस चाहे जो मंसूबे पाले, लेकिन बिहार की भावी राजनीति तेजस्वी यादव, निशांत कुमार, चिराग पासवान के ही इर्द-गिर्द घूमेगी। हालांकि, स्वभाव से सुस्त निशांत कुमार अपने पिता नीतीश कुमार की उम्मीदों पर कितने खरे होंगे, यह तो बिहार विधानसभा चुनाव जनादेश 2025 से ही पता चलेगा। क्योंकि सियासी सफलता के लिए जिस राजनीतिक चतुराई की जरूरत होती है, वह तो उनमें कभी दिखी नहीं। हां, जैसे राजद नेताओं ने राबड़ी देवी को सफल बना दिया, उसी तरह से जदयू नेताओं की फौज निशांत कुमार को भी सफल बना सकती है

Share This Article