SIR विवाद: चुनावी निष्पक्षता पर बढ़ते सवाल, बंगाल में टकराव गहराया

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नया साल केवल उत्सव नहीं, जिम्मेदारी का अवसर
Highlights
  • • सुप्रीम कोर्ट के बाद भी SIR पर संदेह कायम • बंगाल में टीएमसी-भाजपा टकराव से मामला गंभीर • बीएलओ पर दबाव और आत्महत्या के आरोप • विपक्ष का आयोग से पारदर्शिता की मांग • बिहार में शांत लेकिन बंगाल में गहराता संकट

SIR विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद भी संदेह क्यों दूर नहीं हो रहे?

भारत में वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट में कई सुनवाईयों और चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण के बावजूद SIR से जुड़े संदेह समाप्त नहीं हो रहे, और यह स्थिति लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा रही।

देशभर में चल रही इस प्रक्रिया पर कुछ राज्यों में शांति है, लेकिन पश्चिम बंगाल में राजनीतिक टकराव ने इस मसले को बेहद गंभीर रूप दे दिया है

दूसरे चरण में SIR प्रक्रिया 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चल रही है। इनमें केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य शामिल हैं, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता को लेकर उठते सवालों ने तनाव और बढ़ा दिया है।

SIR विवाद: टीएमसी की आपत्ति और चुनाव आयोग से बढ़ता टकराव

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर माहौल अधिक तनावपूर्ण है।

टीएमसी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के सामने जाकर इस प्रक्रिया के औचित्य और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

टीएमसी का आरोप है कि SIR प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

इसी के बीच, भाजपा और टीएमसी के बीच चल रही राजनीतिक कड़वाहट भी इस विवाद को और जटिल बना रही है।

बंगाल की राजनीति में पहले से मौजूद ध्रुवीकरण ने SIR को सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक राजनीतिक हथियार का रूप दे दिया है।

SIR विवाद: क्या यह नागरिकता तय करने का प्रयास है? संदेह अभी भी कायम

सबसे बड़ा भ्रम यही है कि क्या SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता की पहचान तय करना है या नागरिकता?

सुप्रीम कोर्ट ने यह बात स्पष्ट की है कि SIR केवल मतदाता की पहचान से जुड़ा है, नागरिकता से नहीं।

इसके बावजूद कई सीमाई क्षेत्रों में अभी भी भारी असमंजस है।

राजनीतिक दलों की ओर से यह आशंका जताई जा रही है कि SIR के नाम पर नागरिकता पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाला जा सकता है।

यही भ्रम चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को चुनौती देता है।

यह आवश्यक है कि आयोग इन संदेहों को जमीनी स्तर पर दूर करे ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर किसी तरह का संदेह कायम न रहे।

SIR विवाद: बंगाल में बीएलओ पर दबाव, आत्महत्या के आरोप चिंताजनक

सबसे बड़ा मानवीय पहलू बीएलओ (Booth Level Officers) से जुड़ा है, जो SIR प्रक्रिया के वास्तविक क्रियान्वयन की जिम्मेदारी निभाते हैं।

आरोप है कि

• अत्यधिक काम के दबाव

• प्रशासनिक बोझ

• और लगातार राजनीतिक दबाव

के कारण कुछ बीएलओ ने आत्महत्या तक कर ली।

कई जगह लापरवाही के नाम पर उनके खिलाफ कार्रवाई भी की गई है।

हाल ही में बंगाल में बीएलओ ने विरोध मार्च भी निकाला, जिसके बाद

• ममता बनर्जी

• और अखिलेश यादव

ने उनका खुलकर समर्थन किया।

स्पष्ट है कि यह मुद्दा अब राजनीतिक से अधिक मानवीय और प्रशासनिक समस्या बन चुका है।

SIR विवाद: बिहार में शांत प्रक्रिया, बंगाल में क्यों बिगड़ा मामला?

हाल में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष ने SIR को जोरदार मुद्दा बनाया था।

लेकिन चुनाव परिणाम आने पर यह विवाद शांत हो गया, क्योंकि बिहार में किसी भी मतदाता का नाम काटे जाने की शिकायत तक नहीं आई।

इसके उलट, बंगाल में हालात बिल्कुल अलग दिखाई दे रहे हैं।

वहां की राजनीतिक गर्मी और भाजपा-टीएमसी टकराव ने SIR प्रक्रिया को पूरी तरह अशांत और विवादग्रस्त बना दिया है।

बंगाल में

• राजनीतिक अविश्वास

• प्रशासनिक संदेह

• नागरिकों की असमंजस

सब मिलकर इस विवाद को और गहरा रहे हैं।

SIR विवाद: आयोग की विश्वसनीयता को मजबूत करना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट भी यह कह चुका है कि

SIR प्रक्रिया आवश्यक है

चुनाव आयोग के अधिकार वैध हैं

लेकिन विपक्ष की चिंताओं को दूर करना भी आयोग की जिम्मेदारी है।

अगर विपक्ष को लगता है कि उसे सुना नहीं जा रहा, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।

मतदाता सूची का पुख्ता और निष्पक्ष पुनरीक्षण आवश्यक है, लेकिन इसे इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि

• किसी समुदाय को डर न हो

• किसी दल को पक्षपात महसूस न हो

• और मतदाता का भरोसा न टूटे

देश में SIR का उद्देश्य चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को मजबूत करना है — इसे कमजोर करना नहीं।

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