इतिहास इस बात का साक्षी है कि हर युग में कुछ शक्तियां स्वयं को विश्व-राजनीति का नियामक घोषित करती रही हैं। ये शक्तियां तय करती हैं कि कौन लोकतंत्र का रक्षक है और कौन तानाशाह, किसे शांति का प्रतीक कहा जाएगा और किस पर बम गिरना जायज़ ठहराया जाएगा। आज जब “युद्ध की आहट” जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं, तो यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि यह आहट वास्तव में युद्ध की है या फिर डर पैदा करने की राजनीति की। क्योंकि जब डर का माहौल बनाया जाता है, तब विवेक सबसे पहले समाप्त होता है।
- Third World War Warning: ‘आहट’ पैदा कौन कर रहा है?
- Third World War Warning: क्या हालात सच में उतने खतरनाक हैं?
- Third World War Warning: युद्ध अब घोषित नहीं, प्रबंधित किया जाता है
- Third World War Warning: ‘विश्व-नियामकों’ का दोहरा चरित्र
- Third World War Warning: डर की राजनीति और आम जनता
- Third World War Warning: भारत जैसे देशों के लिए सबक
Third World War Warning: ‘आहट’ पैदा कौन कर रहा है?
तीसरे विश्वयुद्ध की चर्चा अचानक नहीं उभरी है। यह किसी प्राकृतिक या अनिवार्य संकट का संकेत नहीं, बल्कि एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक निर्माण है। टीवी स्टूडियो, रणनीतिक रिपोर्टें, थिंक-टैंक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म—सभी मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं जिसमें दुनिया हर समय युद्ध के कगार पर खड़ी दिखाई देती है।
गौर करने वाली बात यह है कि यह डर अधिकतर उन्हीं देशों के मीडिया से निकलता है जो स्वयं को वैश्विक शक्ति मानते हैं। वही देश समाधान भी प्रस्तुत करते हैं—अधिक हथियार, सैन्य गठबंधन और आर्थिक प्रतिबंध। यानी डर पैदा करने वाले भी वही हैं और सुरक्षा बेचने वाले भी वही।
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Third World War Warning: क्या हालात सच में उतने खतरनाक हैं?

यदि भावनाओं और शोर-शराबे से हटकर तथ्यों को देखा जाए, तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यह सही है कि रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है, मध्य-पूर्व लंबे समय से अस्थिर है और अमेरिका-चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। लेकिन इतिहास बताता है कि दुनिया इससे पहले भी कहीं अधिक खतरनाक दौर देख चुकी है।
क्यूबा मिसाइल संकट के समय परमाणु युद्ध वास्तव में एक बटन की दूरी पर था। शीत युद्ध के दशकों में अमेरिका और सोवियत संघ सीधे टकराव के बेहद करीब पहुंचे थे। इसके बावजूद वैश्विक युद्ध नहीं हुआ। कारण साफ था—बड़े देश जानते हैं कि ऐसा युद्ध किसी की जीत नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की हार होगा।
Third World War Warning: युद्ध अब घोषित नहीं, प्रबंधित किया जाता है
आज के दौर में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। अब युद्ध सीधे देशों के बीच नहीं, बल्कि प्रतिनिधियों के माध्यम से लड़े जाते हैं। बम और गोलियों से अधिक असर आर्थिक प्रतिबंधों, साइबर हमलों और सूचना युद्ध का होता है। सैनिकों से ज्यादा आम नागरिक और अर्थव्यवस्था इसकी कीमत चुकाते हैं।
इसी बदले हुए स्वरूप को कुछ शक्तियां जानबूझकर “तीसरा विश्वयुद्ध” कहकर पेश कर रही हैं, ताकि जनता डर में रहे, सैन्य बजट बढ़े और हथियार उद्योग फलता-फूलता रहे। यह वास्तविक युद्ध नहीं, बल्कि युद्ध का नैरेटिव है।
Third World War Warning: ‘विश्व-नियामकों’ का दोहरा चरित्र
जो देश आज शांति, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून की बातें करते हैं, वही अतीत में कई देशों को खंडहर बना चुके हैं। इराक, लीबिया और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं। नियम हमेशा चुन-चुनकर लागू किए जाते हैं।
जब ये शक्तियां युद्ध करती हैं, तो उसे “मानवीय हस्तक्षेप” कहा जाता है। लेकिन जब कोई दूसरा देश वही करता है, तो उसे “विश्व शांति के लिए खतरा” घोषित कर दिया जाता है। यही दोहरापन युद्ध की आहट को संदिग्ध बनाता है।
Third World War Warning: डर की राजनीति और आम जनता
युद्ध की सबसे बड़ी कीमत कभी राजनेता नहीं चुकाते। इसकी कीमत सैनिक, गरीब और आम नागरिक देते हैं। डर का माहौल यह करता है कि लोग सवाल करना बंद कर देते हैं, सैन्य खर्च को अपरिहार्य मान लेते हैं और युद्ध को नियति समझ बैठते हैं।
युद्ध शुरू होने से पहले सबसे पहले विवेक मारा जाता है। इसलिए यह सवाल पूछना ज़रूरी है कि इस डर से किसे फायदा हो रहा है और शांति की आवाजें इतनी कमजोर क्यों दिखाई देती हैं।
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Third World War Warning: भारत जैसे देशों के लिए सबक
भारत जैसे देश, जो न तो वैश्विक प्रभुत्व की दौड़ में हैं और न ही युद्ध से लाभ कमाते हैं, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। किसी भी गुट के प्रचार का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हित को विवेक और संतुलन के आधार पर परिभाषित करना ज़रूरी है।
भारत की असली ताकत युद्ध में नहीं, बल्कि संवाद, संयम, आत्मनिर्भरता और बहुध्रुवीय संतुलन में है। डर के आधार पर निर्णय लेना दीर्घकालीन नुकसान ही देता है।
Third World War Warning: आहट से ज्यादा ज़रूरी है समझ
तीसरे विश्वयुद्ध की आहट जितनी वास्तविक दिखाई जाती है, उतनी अनिवार्य नहीं है। यह सुरक्षा से अधिक राजनीति का औजार बन चुकी है। जो शक्तियां स्वयं को विश्व-राजनीति का नियामक समझती हैं, उनके शोर में बह जाना सबसे बड़ा खतरा है। आज मानवता को युद्ध की नहीं, वैश्विक विवेक की आवश्यकता है—और विवेक हमेशा शोर से दूर, शांत प्रश्नों में जन्म लेता है।
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