Nalanda Mahavihar Ruins: खंडहरों में खड़ा मैं और जलते प्रश्नों की विरासत

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नालंदा महाविहार के खंडहर और जले हुए प्रश्न
Highlights
  • • नालंदा के खंडहर और आत्मग्लानि का भाव • गौरव नहीं, पराजय की स्मृति • मौन में दबे सवालों की विरासत • ज्ञान बनाम सत्ता का संघर्ष • वर्तमान के लिए चेतावनी

Nalanda Mahavihar Ruins से मेरा रिश्ता आकर्षण नहीं, अपराध-बोध है

Nalanda Mahavihar Ruins के साथ मेरा रिश्ता न केवल आकर्षण का है, न श्रद्धा का—यह एक लगातार टीसता हुआ भाव है, जो हर वर्ष मुझे अनायास ही यहाँ खींच लाता है। जैसे कोई अधूरा हिसाब हो, कोई ऐसा प्रश्न जो बार-बार भीतर सिर उठाता हो और जिसका उत्तर मैं इन टूटी दीवारों, झुकी हुई ईंटों और मौन स्तूपों के बीच खोजने चला आता हूँ।

यहाँ खड़े होकर लगता है कि खंडहर मुझसे पूछ रहे हैं—क्या हम उस विरासत के उत्तराधिकारी बन पाए, जिसे कभी ज्ञान का वैश्विक तीर्थ कहा जाता था? या हम केवल उसकी राख पर गर्व करने वाले वंशज बनकर रह गए हैं?

Nalanda Mahavihar Ruins: उजड़े स्वप्न का मलबा और भीतर की बेचैनी

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हर बार Nalanda Mahavihar Ruins में कदम रखते ही ऐसा लगता है जैसे किसी उजड़े हुए स्वप्न के मलबे पर खड़ा हूँ। ईंटों की यह खामोशी और स्तूपों की अधूरी आकृतियाँ भीतर एक अजीब बेचैनी जगा देती हैं।

यह बेचैनी आकर्षण भी है और आत्मग्लानि भी। यहाँ आकर मैं इतिहास नहीं देखता, मैं अपना समय देखता हूँ। नालंदा की खामोशी शांति नहीं देती—वह बेचैन करती है। इन खंडहरों के बीच खड़े होकर लगता है जैसे ज्ञान की कोई जली हुई पांडुलिपि भीतर धधक रही हो—जिसकी राख तो हमारे पास है, पर शब्द कहीं खो गए हैं।

Nalanda Mahavihar Ruins और मौन में दबे प्रश्न

Nalanda Mahavihar Ruins की दीवारों को छूते समय कई बार ऐसा लगता है जैसे उँगलियाँ किसी जले हुए घाव पर रख दी हों। ये दीवारें केवल पत्थर और ईंट नहीं हैं; ये उन प्रश्नों की समाधि हैं जिन्हें हमने पूछना छोड़ दिया।

कभी यहाँ तर्क गूँजता था, संवाद होता था, मतभेद थे—पर मौन नहीं था। आज यहाँ सिर्फ़ सन्नाटा है, और वही सन्नाटा भीतर भी उतर आता है। यह मौन केवल इतिहास का नहीं, हमारी वर्तमान चेतना का भी प्रतीक बन चुका है।

Nalanda Mahavihar Ruins: गौरव नहीं, पराजय की स्मृति

नालंदा मुझे इसलिए नहीं बुलाता कि मैं उसके गौरव पर गर्व करूँ, बल्कि इसलिए बुलाता है कि मैं उसकी पराजय को महसूस कर सकूँ। Nalanda Mahavihar Ruins किसी एक आक्रमण की कहानी नहीं कहते—यह हमारी सामूहिक चेतना की हार की गवाही देते हैं।

ज्ञान को सत्ता से बदल देने की हार,
प्रश्न को सुविधा से बदल देने की हार,
और जिज्ञासा को आज्ञाकारिता से बदल देने की हार।

शायद इसी अपराध-बोध के कारण मैं हर साल यहाँ चला आता हूँ—जैसे क्षमा माँगने, जैसे सिर झुकाने।

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Nalanda Mahavihar Ruins और विरासत से आँख मिलाने का साहस

हम नालंदा को विरासत कहते हैं, लेकिन विरासत को जीने का साहस नहीं जुटा पाते। हम Nalanda Mahavihar Ruins की तस्वीरें लेते हैं, लेकिन उसकी आत्मा से आँख नहीं मिलाते।

यह आत्मा जब मेरी ओर देखती है, तो भीतर कुछ टूटने लगता है। लगता है जैसे हम श्रद्धांजलि शब्दों से देते हैं, पर सवालों से नहीं। जबकि सच्ची श्रद्धांजलि वही होती है, जो प्रश्न करने का साहस लौटाए।

Nalanda Mahavihar Ruins: चेतावनी जो अब भी जीवित है

फिर भी, हर बार लौटते समय एक अजीब-सी उम्मीद साथ चल पड़ती है। शायद इसलिए कि Nalanda Mahavihar Ruins पूरी तरह मरे नहीं हैं। वे इन ईंटों में नहीं, उस बेचैनी में जीवित हैं जो हर वर्ष मुझे यहाँ खींच लाती है।

यह पीड़ा याद दिलाती है कि ज्ञान का पतन केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतावनी है। अगर हमने प्रश्न पूछना छोड़ दिया, तो भविष्य भी खंडहर ही बनेगा।

Nalanda Mahavihar Ruins और वर्तमान की जिम्मेदारी

नालंदा के खंडहर मेरे लिए अतीत का गौरव नहीं, वर्तमान की जिम्मेदारी हैं। यहाँ खड़े होकर लगता है कि श्रद्धांजलि पुष्प नहीं, सवाल होते हैं।

शायद इसलिए मैं हर बार खाली हाथ लौटता हूँ—पर सिर झुकाए। इस उम्मीद के साथ कि किसी दिन हम फिर से ज्ञान को बचाने का साहस जुटा पाएँगे। जहाँ ज्ञान जला था, वहाँ हर बार मेरा मन अपने आप झुक जाता है—किसी अनुष्ठान की तरह नहीं, बल्कि एक मौन स्वीकारोक्ति की तरह।

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