Cable News Culture Crisis: ‘हर चीज़ का केबल न्यूज़ बन जाना’ और भारतीय पत्रकारिता की चुनौती

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आक्रोश और तमाशा बनती भारतीय टीवी बहसें
Highlights
  • • जेम्स मर्डोक की चेतावनी और उसका भारतीय संदर्भ • भारतीय टीवी डिबेट्स का आक्रामक स्वरूप • सोशल मीडिया से तेज़ होता आक्रोश का दुष्चक्र • प्रिंट मीडिया पर बढ़ता सनसनीखेज दबाव • लोकतंत्र और जनविश्वास पर पड़ता असर

Cable News Culture Crisis: जेम्स मर्डोक की चेतावनी और वैश्विक मीडिया का संकट

हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में मीडिया जगत के दिग्गज रूपर्ट मर्डोक के वंशज जेम्स मर्डोक ने एक बेहद सटीक और चिंताजनक वाक्यांश का इस्तेमाल किया— “हर चीज़ का केबल न्यूज़ में तब्दील हो जाना”। इस टिप्पणी के ज़रिए उन्होंने सिर्फ अमेरिकी मीडिया नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक सूचना व्यवस्था की एक गहरी बीमारी की ओर इशारा किया है।

मर्डोक का कहना है कि केबल न्यूज़ के मूल तत्व—संघर्ष, आक्रोश और तमाशा—अब पूरे सूचना तंत्र पर हावी हो चुके हैं। यह प्रवृत्ति जनता के विश्वास को कमजोर करती है और समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है। यह चेतावनी भारत जैसे लोकतांत्रिक और मीडिया-प्रधान देश पर भी पूरी तरह लागू होती दिखती है।

Cable News Culture Crisis: भारतीय टेलीविज़न बहसों का बदलता चरित्र

भारत में टेलीविज़न न्यूज़ डिबेट्स अब संवाद या विमर्श नहीं रहीं। वे रात के समय होने वाले द्वंद्वयुद्ध जैसी हो गई हैं। लगातार “ब्रेकिंग न्यूज़” के बैनर, एंकरों का दिखावटी आक्रोश और यह दावा कि “देश जानना चाहता है”—इन सबने जटिल मुद्दों को चीख-चिल्लाहट में बदल दिया है।

यहाँ बहसें समाधान खोजने के लिए नहीं, बल्कि टकराव पैदा करने के लिए डिज़ाइन की जाती हैं। मुद्दा जितना ज़्यादा विभाजनकारी होता है, उतना ही वह टीवी स्क्रीन पर टिकता है। एंकर की भूमिका निष्पक्ष संचालक से ज़्यादा एक रिंगमास्टर जैसी हो गई है, जहाँ आवाज़ का स्तर तथ्यों से ज़्यादा मायने रखता है।

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Cable News Culture Crisis: ‘शोर’ में दबती जटिलता और तथ्य

Cable News Culture Crisis: ‘हर चीज़ का केबल न्यूज़ बन जाना’ और भारतीय पत्रकारिता की चुनौती 1

भारतीय न्यूज़ चैनलों ने इस शैली का एक तयशुदा फॉर्मूला बना लिया है। हर शाम दर्शकों को ऐसी बहसें दिखाई जाती हैं जिनमें दस वक्ता एक-दूसरे पर चिल्लाते हैं, जबकि एंकर बीच-बीच में हस्तक्षेप कर अपना फैसला सुना देता है।

इस शोर में बारीकियाँ गायब हो जाती हैं। जटिल सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे केवल “हाँ या ना” के टकराव में सिमट जाते हैं। यह प्रारूप उन लोगों को आगे बढ़ाता है जो सबसे तीखे और उग्र बयान दे सकते हैं, न कि उन्हें जो गहराई और संतुलन के साथ विश्लेषण कर सकते हैं।

Cable News Culture Crisis: सोशल मीडिया से और तेज़ होता दुष्चक्र

यह समस्या केवल टेलीविज़न तक सीमित नहीं रहती। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इन बहसों को छोटे-छोटे क्लिप्स में बदलकर व्हाट्सएप और ट्विटर जैसे मंचों पर और तेज़ी से फैलाते हैं।

परिणामस्वरूप एक दुष्चक्र बनता है—टेलीविज़न आक्रोश पैदा करता है, सोशल मीडिया उसे कई गुना बढ़ा देता है, और फिर राजनेता उसी आक्रोश पर प्रतिक्रिया देते हैं। जैसा कि जेम्स मर्डोक ने लिखा है, “केबल न्यूज़ की शैली सभी संचार माध्यमों के लिए मानक बन गई है।” भारत में यह शैली राजनीति और सार्वजनिक संवाद का भी मानक बनती जा रही है।

Cable News Culture Crisis: प्रिंट मीडिया पर बढ़ता दबाव

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि यह संक्रमण अब मुख्यधारा के प्रिंट मीडिया तक पहुँचने लगा है। जो अखबार कभी तथ्यों की जाँच, संतुलन और संदर्भ के लिए जाने जाते थे, वे भी अब प्रासंगिक बने रहने के दबाव में हैं।

संपादकों को यह एहसास रहता है कि जब तक अखबार पाठकों तक पहुँचता है, तब तक जनता पिछली रात का टेलीविज़न संस्करण देख चुकी होती है। ऐसे में उस कथा को चुनौती देने के बजाय उसे दोहराने का प्रलोभन बढ़ जाता है। सुर्खियाँ अधिक सनसनीखेज हो रही हैं और विश्लेषण में भी तीखापन बढ़ रहा है।

Cable News Culture Crisis: लोकतंत्र पर पड़ता असर

इस बदलाव के परिणाम बेहद गंभीर हैं। पहला, पत्रकारिता पर जनता का भरोसा कमज़ोर होता है। जब हर खबर को संकट की तरह पेश किया जाता है, तो पाठक संदेशवाहक की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगते हैं।

दूसरा, ध्रुवीकरण गहराता है। आक्रोश-आधारित पत्रकारिता संयम और संवाद के लिए बहुत कम जगह छोड़ती है।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, लोकतंत्र कमजोर पड़ता है। एक ऐसी जनता जो तमाशे पर पलती है, वह नीति, शासन और नागरिक जिम्मेदारी में सार्थक भागीदारी नहीं कर पाती।

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Cable News Culture Crisis: समाधान क्या है?

इस संकट का समाधान टेलीविज़न या सोशल मीडिया को छोड़ना नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के मूल मूल्यों को फिर से स्थापित करना है। ज़रूरत ऐसे एंकरों की है जो उपदेश देने के बजाय संयम बरतें, ऐसी बहसों की है जो भ्रम के बजाय स्पष्टता दें, और ऐसे अखबारों की है जो रात के शोर को दोहराने के बजाय गहराई प्रदान करें।

यह किसी काल्पनिक स्वर्णिम युग में लौटने की अपील नहीं है, बल्कि इस सच्चाई की स्वीकारोक्ति है कि पत्रकारिता को तेज़ रफ़्तार दुनिया में भी अपनी आत्मा बचाकर चलना होगा।

Cable News Culture Crisis: भारतीय पत्रकारिता की परंपरा और भविष्य

भारत की पत्रकारिता ने अतीत में सत्ता को चुनौती दी है और जनता को जागरूक किया है। आज ज़रूरत है उसी भावना को पुनर्जीवित करने की। पत्रकारिता को शोर नहीं, बल्कि संदर्भ; आक्रोश नहीं, बल्कि निष्पक्षता; और संघर्ष नहीं, बल्कि समझ को प्राथमिकता देनी होगी।

जैसा कि जेम्स मर्डोक की चेतावनी संकेत करती है—अगर व्यावसायिक मॉडल विश्वास को कमजोर करता है, तो लोकतंत्र की जड़ें भी हिलती हैं। भारत में हमें ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो शोर से ऊपर उठ सके। संक्षेप में, हमें बेहतर पत्रकारिता की आवश्यकता है।

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