UGC नया नियमन जातीय भेदभाव को लेकर देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर बहस के केंद्र में है। वर्ष 2019 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला और महाराष्ट्र की महिला चिकित्सक डॉ पायल तडवी की आत्महत्याओं ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातीय उत्पीड़न की भयावह सच्चाई को उजागर किया था। इन घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि ऐसे ठोस नियम बनाए जाएँ, जिनसे छात्रों को जातीय उत्पीड़न से बचाया जा सके। इसी पृष्ठभूमि में यूजीसी ने 13 जनवरी को नया नियमन जारी किया, जिसे 15 जनवरी से पूरे देश में लागू कर दिया गया। लेकिन अब यही नियमन देशभर में बड़े विरोध का कारण बनता जा रहा है।
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: पुराने नियम क्यों साबित हुए नाकाफ़ी?
- सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और UGC नया नियमन जातीय भेदभाव
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: नए नियमों की प्रमुख विशेषताएँ
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: समता समिति का गठन
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: सख़्त कार्रवाई का प्रावधान
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: इक्विटी स्क्वायड
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: समयबद्ध जांच
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: विरोध की असली वजह क्या है?
- UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: राजनीति और सड़कों पर उबाल
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: पुराने नियम क्यों साबित हुए नाकाफ़ी?
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। वर्ष 2012 में हिमाचल प्रदेश में रैगिंग के दौरान एक छात्र की मौत के बाद यूजीसी ने 17 दिसंबर 2012 से सभी मान्यता प्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में रैगिंग और उत्पीड़न रोकने के लिए नियम लागू किए थे। इन नियमों का नाम था प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस।
हालांकि ये नियम महज़ सुझाव और जागरूकता तक सीमित थे। इनमें दोषियों के लिए सख़्त सजा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। अधिकांश मामलों में चेतावनी देकर मामला खत्म कर दिया जाता था। झूठी शिकायत पाए जाने पर जुर्माने और दंड का प्रावधान जरूर था, लेकिन वास्तविक उत्पीड़न के मामलों में कार्रवाई अक्सर कमजोर रहती थी।
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सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और UGC नया नियमन जातीय भेदभाव

पिछले साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को कॉलेजों में जातीय भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का डाटा इकट्ठा करने और नया नियमन लाने का निर्देश दिया। इसके बाद यूजीसी ने एक ड्राफ्ट जारी किया, जिस पर ओबीसी छात्रों ने आपत्ति जताई। उनकी मांग थी कि जांच समितियों में ओबीसी छात्रों को भी शामिल किया जाए।
इसी बीच दिसंबर में संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों की स्थायी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में समता समिति में ओबीसी प्रतिनिधित्व की सिफारिश कर दी। इन तमाम बिंदुओं के आधार पर यूजीसी ने 13 जनवरी को नया नियमन अधिसूचित किया।
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: नए नियमों की प्रमुख विशेषताएँ
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: समता समिति का गठन
हर यूजीसी मान्यता प्राप्त कॉलेज और विश्वविद्यालय में इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेंटर यानी समता समिति बनाना अनिवार्य किया गया है। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के सदस्य शामिल होंगे। समिति का अध्यक्ष कॉलेज के प्राचार्य होंगे।
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: सख़्त कार्रवाई का प्रावधान
शिकायत सही पाए जाने पर आरोपी छात्र की डिग्री रोकी जाएगी, आर्थिक दंड लगेगा और आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया जाएगा। खास बात यह है कि झूठी शिकायत पर शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, जबकि पहले दंड का प्रावधान था।
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: इक्विटी स्क्वायड
हर कॉलेज में एक इक्विटी स्क्वायड बनाया जाएगा, जो परिसर में निगरानी करेगा और जातीय भेदभाव को रोकेगा। इसमें केवल एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय से जुड़े मामलों को जातीय भेदभाव माना गया है।
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: समयबद्ध जांच
शिकायत मिलने पर 24 घंटे में समिति की बैठक, 15 दिनों में रिपोर्ट और 7 दिनों में उप कुलपति को कार्रवाई रिपोर्ट देना अनिवार्य होगा। हर साल यूजीसी को रिपोर्ट भेजी जाएगी।
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UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: विरोध की असली वजह क्या है?
विरोध करने वालों का कहना है कि समता समिति की संरचना ऐसी है, जिसमें अगड़ी जातियों के छात्रों का पक्ष कमजोर हो जाएगा। उनका तर्क है कि एससी, एसटी, ओबीसी और महिला सदस्य होने के कारण अगड़ी जाति के छात्र स्वतः ही निशाने पर आ सकते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता सूर्यकेश्वर सिंह इसे समाज के लिए आत्मघाती कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि बिना संतुलन के आपराधिक मुकदमे दर्ज होने लगे तो छात्रों का भविष्य बर्बाद हो सकता है।
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव: राजनीति और सड़कों पर उबाल
करणी सेना ने इस मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। भाजपा के अगड़ी जाति से जुड़े कई स्थानीय नेताओं ने इस्तीफे देने शुरू कर दिए हैं।
एनडीए, आरएसएस और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। विपक्ष भी खुलकर बोलने से बच रहा है। वहीं, प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता विरोध में उतर आए हैं। छात्रों का आंदोलन लगातार तेज़ होता जा रहा है।
UGC नया नियमन जातीय भेदभाव उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता लाने का दावा करता है, लेकिन इसके विरोध ने इसे सामाजिक और राजनीतिक टकराव का केंद्र बना दिया है। अगर समय रहते संतुलित समाधान नहीं निकाला गया, तो यह मुद्दा आने वाले दिनों में और विस्फोटक हो सकता है।
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