POCSO Act Romeo Juliet Clause: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, क्या बदल जाएगा किशोर संबंधों पर कानून?

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पोक्सो एक्ट संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
Highlights
  • • सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो एक्ट दुरुपयोग पर चिंता जताई • ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज जोड़ने का सुझाव • NCRB रिपोर्ट में 2,478 नाबालिग आरोपी • सहमति संबंध भी बन रहे आपराधिक केस • अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला

POCSO Act Romeo Juliet Clause: दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

किशोर यौन शोषण संरक्षण अधिनियम, 2012 यानी पोक्सो एक्ट को बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन समय के साथ इसके कुछ प्रावधानों के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। वर्ष 2026 के बजट सत्र के बीच एक अहम कानूनी बहस तब तेज हुई जब सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को सुझाव दिया कि कानून में ‘रोमियो-जूलियट’ उपबन्ध जोड़ने पर विचार किया जाए।

अदालत की यह टिप्पणी केवल कानूनी तकनीकी सुझाव नहीं बल्कि सामाजिक यथार्थ से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। न्यायालय का मानना है कि किशोरों के बीच पारस्परिक सहमति से बने संबंधों को कठोर आपराधिक दायरे में रखना व्यावहारिक न्याय के सिद्धांत से मेल नहीं खाता।

इस परामर्श का उद्देश्य दोहरा है—एक ओर वास्तविक यौन शोषण के मामलों में कानून की सख्ती बनी रहे और दूसरी ओर सहमति आधारित किशोर संबंधों को अनावश्यक अपराधीकरण से बचाया जा सके।

POCSO Act Romeo Juliet Clause: NCRB रिपोर्ट ने बढ़ाई बहस

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट ‘क्राइम इन इंडिया-2023’ ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। आंकड़ों के अनुसार पोक्सो एक्ट के तहत कुल 7,305 मामले दर्ज हुए। इनमें:
• 4,321 मामले बलात्कार श्रेणी के
• 2,619 गलत यौन स्पर्श से जुड़े
• 264 अन्य यौन उत्पीड़न के

चौंकाने वाली बात यह रही कि इन मामलों में 18 वर्ष से कम आयु के 2,478 नाबालिग भी संलिप्त पाए गए जिन्हें हिरासत में लिया गया। यही वह बिंदु है जिसने न्यायपालिका को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या हर किशोर संबंध को समान रूप से अपराध मानना न्यायसंगत है।

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POCSO Act Romeo Juliet Clause: कानून की वर्तमान स्थिति और दुविधा

POCSO Act Romeo Juliet Clause: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, क्या बदल जाएगा किशोर संबंधों पर कानून? 1

वर्तमान कानूनी ढांचे के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों के बीच शारीरिक संबंध पूर्णतः प्रतिबंधित और संगीन अपराध की श्रेणी में आते हैं। यहां सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है।

यही कारण है कि पुलिस और जांच एजेंसियां अक्सर दुविधा में पड़ जाती हैं—क्या वे कानून को अक्षरशः लागू करें या परिस्थितियों को देखते हुए विवेक का उपयोग करें? लेकिन निचली अदालतों और पुलिस के पास विवेकाधीन छूट नहीं होती; वे केवल लिखित कानून लागू करने के लिए बाध्य हैं।

इसी जटिलता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया कि ऐसा प्रावधान बनाया जाए जिससे सहमति आधारित किशोर संबंधों के मामलों में बार-बार उच्च न्यायालयों की शरण लेने की जरूरत न पड़े।

‘रोमियो-जूलियट’ उपबन्ध क्या है?

‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रथाओं में पहले से मौजूद एक सिद्धांत है। इसका मूल उद्देश्य यह अंतर स्पष्ट करना है कि कौन-सा संबंध शोषणकारी है और कौन-सा पारस्परिक सहमति पर आधारित।

इस उपबन्ध के तहत समान या निकट आयु वर्ग के किशोरों के बीच बने संबंधों को आपराधिक अपराध नहीं माना जाता, बशर्ते उसमें दबाव, धोखा या शोषण के तत्व न हों।

यह मानव विकास प्रक्रिया को ध्यान में रखकर बनाया गया प्रावधान माना जाता है, जो किशोरावस्था की मनोवैज्ञानिक और जैविक वास्तविकताओं को स्वीकार करता है।

POCSO Act Romeo Juliet Clause: अंतरराष्ट्रीय कानूनी उदाहरण

दुनिया के कई देशों ने इस प्रकार के प्रावधान अपनाए हैं:
• संयुक्त राज्य अमेरिका: कम से कम 43 राज्यों में “क्लोज-इन-एज” छूट लागू
• कनाडा: 14-15 वर्ष के किशोर अपने से 5 वर्ष बड़े साथी तक सहमति संबंध बना सकते हैं
• फिलीपींस: 16 वर्ष आयु पर 3 वर्ष आयु अंतर तक अनुमति
• जॉर्जिया: 3 वर्ष आयु अंतर तक सहमति संबंध को अपराध नहीं माना जाता

इन उदाहरणों का उद्देश्य यह दिखाना है कि कानून शोषण और सहमति के बीच संतुलन बनाकर चल सकता है।

भारत में अभी सहमति की आयु 18 वर्ष है और यहां तक कि नाबालिग पत्नी भी असहमति संबंध पर पति के विरुद्ध मामला दर्ज करा सकती है। पोक्सो एक्ट लिंग-निरपेक्ष है और सहमति को मान्यता नहीं देता।

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POCSO Act Romeo Juliet Clause: धारा 19(1) और रिपोर्टिंग का दबाव

पोक्सो एक्ट की धारा 19(1) इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसके तहत यदि किसी व्यक्ति—यहां तक कि डॉक्टर—को भी नाबालिग के यौन गतिविधि में शामिल होने की जानकारी मिलती है तो पुलिस को सूचना देना अनिवार्य है।

रिपोर्ट न करने पर 6 माह तक कारावास का प्रावधान है।

इसका व्यावहारिक प्रभाव यह पड़ा है कि:
• नाबालिग गर्भवती लड़कियां उपचार से कतराती हैं
• किशोर मेडिकल सलाह लेने से डरते हैं
• झोलाछाप चिकित्सकों का सहारा लेते हैं

यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी गंभीर चिंता का विषय है।

सामाजिक दबाव और फर्जी मुकदमे

कई मामलों में माता-पिता सामाजिक प्रतिष्ठा या निजी प्रतिशोध के कारण सहमति संबंधों को भी बलात्कार या छेड़छाड़ का रूप देकर शिकायत दर्ज करा देते हैं।

वर्ष 2023 में नाबालिगों के विरुद्ध दर्ज 2,478 मामलों में ऐसे कई संबंध शामिल बताए जाते हैं जो जिज्ञासावश या सहमति पर आधारित थे।

यही वह क्षेत्र है जहां कानून और सामाजिक वास्तविकता के बीच टकराव स्पष्ट दिखता है।

संभावित कानूनी और सामाजिक प्रभाव

यदि ‘रोमियो-जूलियट’ उपबन्ध जोड़ा जाता है तो इसके कई प्रभाव हो सकते हैं:
• सहमति संबंधों में किशोरों का अपराधीकरण कम होगा
• अदालतों पर मुकदमों का बोझ घटेगा
• पुलिस को विवेकाधीन वर्गीकरण का आधार मिलेगा
• स्वास्थ्य सेवाओं तक किशोरों की पहुंच सुधरेगी

हालाँकि आलोचकों का तर्क है कि इससे कानून का दुरुपयोग कर शोषण को सहमति बताने की कोशिश भी हो सकती है। इसलिए संतुलित और स्पष्ट आयु-अंतर सीमा तय करना अहम होगा।

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