बिहार की राजनीति में एक साधारण सा सरकारी पत्र भी बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर सकता है। ऐसा ही हुआ जब भवन निर्माण विभाग ने विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी को 39, हार्डिंग रोड स्थित बंगला आवंटित करने का पत्र जारी किया। पत्र सामने आते ही यह चर्चा तेज हो गई कि उन्हें 20 वर्षों से अधिक समय से रह रहे 10 सर्कुलर रोड वाले आवास को खाली करना होगा।
लेकिन 90 दिन बीत जाने के बाद भी न तो आवास खाली हुआ और न ही सरकार की ओर से कोई कड़ी कार्रवाई हुई। आखिर क्यों यह फैसला ठंडे बस्ते में चला गया? क्या यह सिर्फ प्रशासनिक आदेश था या इसके पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी थी?
Rabri Devi Bungalow Controversy: भाजपा दबाव, अंदरखाने की राजनीति और आधा-अधूरा आदेश
सूत्रों के अनुसार, यह आदेश अचानक नहीं निकला। बताया जा रहा है कि भाजपा के एक प्रभावशाली नेता की पहल पर यह फाइल आगे बढ़ी। नई सरकार बनने के बाद शक्ति संतुलन बदलने के साथ कुछ नेताओं ने पुराने आवासों की समीक्षा शुरू की।
भवन निर्माण विभाग की जिम्मेदारी जदयू कोटे के मंत्री विजय चौधरी के पास है, जिन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का करीबी माना जाता है। चर्चा है कि भाजपा नेता के संकेत पर संबंधित अधिकारी ने 39 हार्डिंग रोड का आवंटन पत्र जारी कर दिया।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात हुई—
• नया बंगला आवंटित किया गया
• पर 10 सर्कुलर रोड खाली करने का स्पष्ट नोटिस जारी नहीं हुआ
• पुराने आवास को किसी और मंत्री को आवंटित नहीं किया गया
यानी आदेश था, पर अमल की प्रक्रिया अधूरी रही। यही कारण है कि मामला प्रशासनिक से ज्यादा राजनीतिक बन गया।
बताया जा रहा है कि उस समय गृह मंत्रालय से जुड़े फैसलों के बाद कुछ अफसरों में नेतृत्व को लेकर भ्रम की स्थिति थी, जिससे आदेश जल्दबाज़ी में आगे बढ़ गया।
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Rabri Devi Bungalow Controversy में मीडिया एंट्री के बाद बदला माहौल

जब मीडिया में खबरें चलने लगीं कि राबड़ी देवी को 10 सर्कुलर रोड खाली करना होगा, तब राजनीतिक हलचल और तेज हो गई। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री को पूरे मामले की विस्तृत जानकारी पहले नहीं थी।
रिपोर्ट्स सामने आने के बाद उन्होंने संबंधित अधिकारी को बुलाकर पूरी स्थिति जानी। इसके बाद मामला ठंडा पड़ गया।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री ने सहयोगी दल के नेता से बातचीत कर विभागीय मर्यादा का ध्यान रखने की सलाह दी। इसके बाद से फाइल आगे नहीं बढ़ी।
यानी एक प्रशासनिक आदेश, मीडिया की सुर्खियों और सत्ता संतुलन की वजह से राजनीतिक संवेदनशीलता का विषय बन गया।
39 हार्डिंग रोड बंगला: सुविधाएं, मरम्मत और तैयार नई कोठी
राबड़ी देवी को आवंटित 39 हार्डिंग रोड स्थित बंगले की मरम्मत लगभग पूरी हो चुकी है।
इस बंगले की प्रमुख विशेषताएं:
• दो मंजिला मुख्य भवन
• ऊपर 3 और नीचे 3 बड़े बेडरूम
• ड्राइंग रूम, डाइनिंग रूम और बड़ा हॉल
• स्टाफ क्वार्टर और सुरक्षा कर्मियों के लिए अलग व्यवस्था
• बड़ा फ्रंट लॉन और विस्तृत गार्डन
बगीचे में नीम, पीपल, अमलतास, अशोक, आम, जामुन और गुलमोहर जैसे पेड़ हैं। मौसमी फूलों और किचन गार्डन की व्यवस्था भी की गई है।
बिजली, प्लंबिंग और रंग-रोगन का काम पूरा बताया जा रहा है। साफ संकेत है कि नया आवास तैयार है।
परिवार और राजनीतिक प्रतीक: क्यों मुश्किल है शिफ्ट होना?
हालांकि बंगला बड़ा है, लेकिन अगर पूरा परिवार—दोनों बेटे, बेटियां और उनके बच्चे—एक साथ रहें तो जगह सीमित पड़ सकती है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भावनात्मक और राजनीतिक है। 10 सर्कुलर रोड लंबे समय से उनका राजनीतिक केंद्र रहा है। यह सिर्फ मकान नहीं, बल्कि एक पहचान बन चुका है। ऐसे में अचानक बदलाव राजनीतिक संदेश भी दे सकता है।
तीसरा कारण सरकार की अनिच्छा माना जा रहा है। यदि सरकार वास्तव में सख्त होती, तो:
• स्पष्ट खाली करने का नोटिस जारी होता
• समयसीमा तय होती
• आवास किसी अन्य नेता को आवंटित किया जाता
इनमें से कोई कदम नहीं उठाया गया।
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आवास आवंटन की प्रक्रिया क्या कहती है?
सरकारी नियमों के अनुसार, मंत्रियों और विधान परिषद सदस्यों को उनकी श्रेणी के अनुसार आवास मिलता है। 39 हार्डिंग रोड का आवंटन नेता प्रतिपक्ष के आधार पर किया गया।
सामान्य प्रक्रिया में:
1. आवंटन पत्र जारी
2. पुराने आवास को खाली करने की समयसीमा
3. निर्धारित समय के बाद कार्रवाई
लेकिन यहां दूसरा और तीसरा चरण लागू नहीं हुआ।
सियासत भारी, आदेश हल्का
पूरे घटनाक्रम से साफ है कि मामला नियमों से ज्यादा राजनीति का है। सत्ता संतुलन, सहयोगी दलों की संवेदनशीलता और वरिष्ठ नेताओं का सम्मान—इन सबने मिलकर इस फाइल को रोक दिया।
फिलहाल स्थिति यथावत है। नया बंगला तैयार है, पुराना खाली नहीं हुआ है, और सरकार सख्ती के मूड में नहीं दिख रही।
आने वाले समय में यदि 10 सर्कुलर रोड किसी और को आवंटित किया जाता है या औपचारिक नोटिस जारी होता है, तब तस्वीर बदल सकती है। अभी के लिए यह मामला बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प सियासी यू-टर्न बन चुका है।
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