Bihar Bribery Case: पोस्टमैन की गिरफ्तारी से खुली रिश्वत की चेन, CBI के खुलासे और सुप्रीम कोर्ट पर उठते सवाल

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पोस्टमैन की गिरफ्तारी से सामने आई रिश्वत की चेन
Highlights
  • • बिहार में पोस्टमैन रिश्वत कांड का खुलासा • CBI के सामने वरिष्ठ अधिकारी का नाम • जांच एजेंसियों की कानूनी सीमाएं • नार्को टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का रुख • राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम मानवाधिकार की बहस

बिहार में सामने आया एक रिश्वत कांड केवल एक पोस्टमैन या एक डाक सेवक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र में फैली उस सच्चाई को उजागर करता है, जिसे आमतौर पर दबा दिया जाता है। गिरफ्तार पोस्टमैन श्री लाल ने सीबीआई दस्ते के सामने यह स्वीकार किया कि वह डाक अधीक्षक मारुत नंदन के कहने पर डाक सेवक बिट्टू कुमार से 30 हजार रुपये की रिश्वत ले रहा था। इस पूरे मामले की खबर पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर में पहले पन्ने पर छपी है।

यह स्वीकारोक्ति अपने आप में असाधारण है, क्योंकि आम तौर पर निचले स्तर का कोई भी सरकारी कर्मी या अधिकारी जांच एजेंसियों के सामने अपने से ऊपर के अफसर का नाम लेने से बचता है। यही वजह है कि देश में भ्रष्टाचार की जड़ तक जांच एजेंसियां कभी पहुंच ही नहीं पातीं।

Bihar Bribery Case और सरकारी तंत्र की कड़वी सच्चाई

सरकारी दफ्तरों की एक कड़वी हकीकत यह है कि निचले स्तर पर रिश्वत लेने वाले कर्मी निजी बातचीत में अक्सर यह मान लेते हैं कि वे जो पैसा लेते हैं, उसका हिस्सा ऊपर तक जाता है। कई बार तो वे साफ कहते हैं कि हम ऊपर वाले के लिए ही वसूली करते हैं।

लेकिन यही बात जब किसी जांच एजेंसी के सामने रखने की बारी आती है, तो वही कर्मी चुप्पी साध लेते हैं। नतीजा यह होता है कि ऊपर बैठा संरक्षक हमेशा कानून की पकड़ से बाहर रह जाता है और पूरा दोष किसी क्लर्क, पोस्टमैन या छोटे कर्मचारी पर डालकर मामला बंद कर दिया जाता है।

बिहार का यह मामला इसलिए अहम है, क्योंकि इसमें पहली बार किसी निचले स्तर के कर्मी ने सीधे अपने वरिष्ठ अधिकारी का नाम लिया है।

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Bihar Bribery Case और जांच एजेंसियों की सीमाएं

Bihar Bribery Case: पोस्टमैन की गिरफ्तारी से खुली रिश्वत की चेन, CBI के खुलासे और सुप्रीम कोर्ट पर उठते सवाल 1

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर जांच एजेंसियों की सीमाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस तरह से घूसखोरी, संगठित अपराध और आतंकी गतिविधियां नेटवर्क के रूप में काम करती हैं, उसी तरह भ्रष्टाचार भी एक चेन सिस्टम है। लेकिन जांच एजेंसियां अक्सर इस चेन की आखिरी कड़ी तक ही सीमित रह जाती हैं।

आतंकी या जिहादी गतिविधियों में पकड़े गए लोग भी अक्सर कई महत्वपूर्ण जानकारियां जांच एजेंसियों से छुपा लेते हैं। नतीजतन, अपराध की जड़ तक पहुंचने का सुराग हाथ नहीं लगता। जबकि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक साधन उपलब्ध हैं, जिनके जरिए सच उगलवाया जा सकता है।

Bihar Bribery Case: नार्को टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार यह निर्णय दिया है कि जबरन या अनैच्छिक नार्को-विश्लेषण, ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट असंवैधानिक हैं और यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। कोर्ट का कहना है कि ऐसे परीक्षण केवल आरोपी की सहमति से ही कराए जा सकते हैं।

यही वह बिंदु है, जहां से जांच एजेंसियों के हाथ बंध जाते हैं। अगर अपराधी सहमति ही नहीं देगा, तो जांच आगे कैसे बढ़ेगी? नतीजतन बड़े-बड़े भ्रष्ट, अपराधी और देशद्रोही तत्व सजा से बच निकलते हैं।

Bihar Bribery Case: राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम मानवाधिकार की बहस

इस मुद्दे पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अपराधियों और देशद्रोही तत्वों के मानवाधिकार, देश की सुरक्षा और पीड़ितों के अधिकारों से ऊपर हैं? यह तर्क दिया जाता है कि मानवाधिकार सर्वोपरि हैं, लेकिन अगर देश ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो मानवाधिकार किसके रहेंगे?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल कई बार यह कह चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट को सामान्य अपराध और आतंकी अपराध के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस बदलाव देखने को नहीं मिला है।

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Bihar Bribery Case: अंतरराष्ट्रीय उदाहरण और भारत की स्थिति

यूरोप के कई देश आज अपनी पुरानी मानवाधिकार नीतियों को लेकर पछता रहे हैं। शरणार्थियों के नाम पर बड़े पैमाने पर घुसपैठ की अनुमति दी गई, और अब वही देश सामाजिक असंतुलन और सुरक्षा संकट से जूझ रहे हैं। ब्रिटेन के कई शहरों में मुस्लिम मेयर चुने जा चुके हैं और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में भी नई प्राथमिकताएं खुलकर सामने आ रही हैं।

भारत में भी अगर समय रहते कठोर निर्णय नहीं लिए गए, तो भविष्य में स्थिति और भयावह हो सकती है।

Bihar Bribery Case: समाधान क्या हो सकता है?

अब सवाल उठता है कि रास्ता क्या है। केंद्र सरकार के पास यह विकल्प है कि वह कानून में संशोधन करे और जांच एजेंसियों को यह अधिकार दे कि गंभीर अपराध, भ्रष्टाचार और आतंकी मामलों में अदालत की पूर्व अनुमति के बिना भी नार्को, ब्रेन मैपिंग जैसे टेस्ट कराए जा सकें।

ऐसे संशोधन को संविधान की नौवीं अनुसूची में डालकर न्यायिक हस्तक्षेप से भी बचाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के पास अनुच्छेद 142 जैसा शक्तिशाली प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल राम मंदिर जैसे जटिल मामले में किया गया। उसी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी असाधारण कदम उठाए जाने चाहिए।

बिहार का यह रिश्वत मामला केवल एक खबर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है। अगर जांच एजेंसियों को मजबूत कानूनी औजार नहीं दिए गए, तो ऊपर बैठे असली गुनहगार हमेशा बचते रहेंगे। भ्रष्टाचार, आतंक और संगठित अपराध से निपटने के लिए अब भावनात्मक नहीं, बल्कि कठोर और व्यावहारिक फैसलों की जरूरत है। देर हुई तो कीमत देश को चुकानी पड़ेगी।

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