नेपाल में राजतंत्र की पुनर्स्थापना की मांग की तेज नेपाल से वामपंथ की विदाई के बनते माहौल से शासक वर्ग सकते में

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रक्सौल, संवाददाता
नेपाल जैसे छोटे से देश का वामपंथ से मोहभंग हो जाने से चीन जैसी ताकतों को झटका लग सकता है या नहीं यह एक सवाल है लेकिन नेपाल में राजतंत्र की वापसी की मांग समस्त नेपालवासियों की नई ऊर्जा का का उद्घोष जरूर है। नेपाल का मौजूदा वामपंथी शासक वर्ग इस मांग से इसलिए भी ज्यादा असहज होता जा रहा है क्योंकि राजनीतिक दल और उनके समर्थक बड़े पशोपेश में हैं। अगर वह राजतंत्र का समर्थन करते हैं तब उनकी राजनीति नेपथ्य में चली जाएगी और लोकतंत्र के लिए खड़े होते हैं तब आम नेपालियों का समर्थन उन्हें नहीं मिलेगा।
वर्ष 2008 में राजतंत्र के खूनी खात्मे के बाद महज डेढ़ दशक से थोड़ा ज्यादा समय में ही नेपाल से वामपंथ की विदाई का जो माहौल बनता जा रहा है उससे मौजूदा शासक वर्ग पैरालिटिक अटैक की स्थिति में है। भावनाओं से उनका खिलवाड़ नेपाल में स्थाई स्वरूप ले पता उसके पहले ही उसकी संरचना दरकने लगी है। जब नेपाल में राजतंत्र था, राजा और प्रजा के बीच अटूट संबंध थे। प्रजा राजा को अपना संरक्षक और ईश्वर का स्वरूप मानती थी। नेपाल की जनता अपने राजा की तस्वीरों को मंदिरों में रखकर पूजा करती थी।
नेपाल की जनता आज भी अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहती है – ‘हमरो राजा, हमरो देश, प्राण बन्दा प्यारो छ।’ (हमारा राजा, हमारा देश, हमारे प्राणों से भी प्यारा है)। लेकिन यह प्यार, यह श्रद्धा, समय के साथ राजनीति की भूल भुलैया में खो गया। जब नेपाल से राजतंत्र समाप्त हुआ, तब जनता ने एक नये राजनीतिक तंत्र को अपनाया, लेकिन वह तंत्र न तो नेपाल की प्रजा को वह सुख दे पाया और न ही देश को स्थिरता।
राजतंत्र समाप्त होते ही नेपाल में अस्थिरता का दौर शुरू हो गया। देश में नेताओं ने सत्ता की होड़ मचा दी। भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अव्यवस्था बढ़ती चली गई। जनता को उम्मीद थी कि लोकतंत्र उन्हें नए अवसर देगा, लेकिन वे जल्द ही समझ गए कि सत्ता के लालच में नेताओं ने जनता के कल्याण को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है।
राजनीतिक दलों ने अपने निजी स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए देश की संपत्ति को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राजा के समय जो धन देश के विकास में लगता था, वह अब नेताओं की तिजोरी में जा रहा था। नेपाल की ऐतिहासिक धरोहरें, संस्कृति और धार्मिक स्थलों की उपेक्षा की जाने लगी। आर्थिक संकट बढ़ता चला गया, महंगाई आसमान छूने लगी, और गरीब जनता को दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। अब, जब जनता अपने संघर्ष की चरम सीमा पर पहुँच चुकी है, तब वे फिर से एक बार राजतंत्र की पुनर्स्थापना की मांग कर रहे हैं। नेपाल में जगह-जगह पर ‘राजा लाओ, देश बचाओ’ के नारे गूंजने लगे हैं। जनता को यकीन है कि यदि नेपाल में फिर से राजतंत्र की स्थापना होती है, तो देश एक बार फिर से अपने सुनहरे दिनों की ओर लौट सकेगा।

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