Indian Journalism Left Ideology Debate: भारतीय पत्रकारिता की आत्मा, विचारधारा और समाज से बढ़ती दूरी

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भारतीय पत्रकारिता और विचारधारा पर विश्लेषण
Highlights
  • • भारतीय पत्रकारिता का ऐतिहासिक चरित्र • वामपंथ की दो संवेदनशीलताएं • सभ्यतागत शंका और मीडिया • न्यूजरूम की वैचारिक एकरूपता • पत्रकारिता और समाज के बीच दूरी

भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत किसी विचारधारा की प्रयोगशाला में नहीं हुई थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में पत्रकारिता राष्ट्रवादी चेतना की संवाहक थी, समाज सुधार का माध्यम थी और सभ्यतागत रूप से भारतीय थी। उसका संघर्ष सत्ता से था, समाज से नहीं। वह धर्म की आलोचना कर सकती थी, लेकिन संस्कृति को नष्ट करने का आग्रह उसमें कभी नहीं रहा। आज पत्रकारिता जिस वैचारिक संकट से गुजर रही है, उसकी जड़ें इसी ऐतिहासिक विचलन में छिपी हैं।

स्वतंत्रता के बाद सत्ता-चरित्र की अपनी एक परिभाषा बनी। पत्रकारिता ने खुद को सत्ता-विरोध का एकमात्र नैतिक प्रहरी मान लिया। लेकिन समय के साथ यह समझ विकसित नहीं हो पाई कि सत्ता-विरोध और समाज-विरोध के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। यहीं से एक ऐसी वैचारिक प्रवृत्ति हावी हुई जिसने भारतीय समाज की स्वाभाविक संरचना को ही संदेह के घेरे में खड़ा करना शुरू कर दिया।

Indian Journalism Left Ideology Debate और वामपंथ की पहली संवेदनशीलता

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वामपंथ की पहली संवेदनशीलता सामाजिक न्याय से जुड़ी रही है। हाशिए पर खड़े वर्गों की आवाज़ बनना, सत्ता से सवाल पूछना और व्यवस्था की कमियों को उजागर करना पत्रकारिता का मूल धर्म है। इस दृष्टि से वामपंथी आलोचना में कोई समस्या नहीं है।

सत्ता की आलोचना लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। यदि पत्रकारिता यह भूमिका न निभाए, तो वह प्रचार में बदल जाती है। सामाजिक असमानताओं पर सवाल उठाना, अधिकारों की बात करना और शोषण के खिलाफ खड़ा होना पत्रकारिता का नैतिक दायित्व है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यह संवेदनशीलता एकमात्र सत्य की तरह प्रस्तुत की जाने लगती है और बाकी सभी सामाजिक अनुभवों को अमान्य ठहरा दिया जाता है।

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Indian Journalism Left Ideology Debate और सभ्यतागत शंका की आक्रामकता

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वामपंथ की दूसरी प्रवृत्ति अधिक जटिल और आक्रामक है — सभ्यतागत शंका। इस दृष्टिकोण में परंपरा पिछड़ेपन का प्रतीक बन जाती है, धर्म एक समस्या घोषित कर दिया जाता है और आस्था को अंधविश्वास का नाम देकर सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने का प्रयास होता है।

भारतीय समाज की बहुसंख्यक संस्कृति को स्वाभाविक रूप से संदिग्ध मानना, उसके उत्सवों को पर्यावरणीय खतरा बताना और परिवार को केवल पितृसत्ता का अड्डा मानना — यह आलोचना से अधिक पूर्वाग्रह प्रतीत होता है।

यह दृष्टि भारतीय जीवन-शैली की मूल प्रकृति को समझने में असफल रहती है। भारतीय समाज सामुदायिक है, संवाद-प्रधान है, और परंपरा के भीतर परिवर्तन खोजता है — विध्वंस के माध्यम से नहीं।

Indian Journalism Left Ideology Debate और समाज से कटती मुख्यधारा पत्रकारिता

आज की मुख्यधारा पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा सत्ता से कम और समाज से अधिक टकराता हुआ दिखाई देता है। जनता मंदिर जाती है, तो प्रश्न उठाए जाते हैं। जनता सेना पर गर्व करती है, तो संरचनात्मक संदेह खड़ा किया जाता है। राष्ट्र को भावनात्मक इकाई मानने वाली जनता को बताया जाता है कि यह भावना “गढ़ी हुई” है।

यह टकराव स्वाभाविक रूप से दूरी पैदा करता है। समाज अनुभव से सोचता है, पत्रकारिता सिद्धांत से। जब पत्रकारिता समाज को समझने के बजाय उसे “शिक्षित” करने की मुद्रा अपनाती है, तो उसकी विश्वसनीयता कमजोर होती जाती है।

Indian Journalism Left Ideology Debate में न्यूजरूम की एकरूपता

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यह कहना बौद्धिक बेईमानी होगी कि पूरी पत्रकारिता वामपंथी है। लेकिन यह सच है कि न्यूजरूम की भाषा, अकादमिक संदर्भ और बौद्धिक स्रोत अक्सर एक ही वैचारिक खांचे से आते हैं।

कुछ प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं, कुछ विषय लगातार नजरअंदाज होते हैं और कुछ भावनाओं को वैध ही नहीं माना जाता। विविधता की जगह एकरूपता हावी हो जाती है। यही कारण है कि पत्रकारिता और समाज के बीच संवाद कमजोर पड़ता जा रहा है।

Indian Journalism Left Ideology Debate में दक्षिणपंथी जाल का खतरा

इस पूरे विमर्श का यह अर्थ नहीं कि अंध-दक्षिण झुकाव बेहतर विकल्प है। यदि वाम झुकाव संस्कृति से कटता है, तो अंध-दक्षिण झुकाव सत्ता से चिपक जाता है। एक समाज से सवाल करना छोड़ देता है, दूसरा सत्ता से।

दोनों ही स्थितियाँ पत्रकारिता को कमजोर करती हैं। असली संकट विचारधारा नहीं, बल्कि जिज्ञासा का लोप है। जब पत्रकारिता सवाल पूछने के बजाय फैसला सुनाने लगे, तब वह अपना मूल धर्म खो देती है।

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Indian Journalism Left Ideology Debate और पत्रकारिता की खोती आत्मा

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भारतीय पत्रकारिता का संकट लेफ्ट या राइट नहीं है। संकट यह है कि वह संवेदनशीलता छोड़कर उपदेश देने लगी है, संवाद छोड़कर निर्णय सुनाने लगी है।

भारतीय समाज उपदेश नहीं चाहता। वह सुना जाना चाहता है। उसे न आयातित चश्मा चाहिए, न वैचारिक प्रचार। उसे चाहिए ऐसी पत्रकारिता जो सभ्यतागत आत्मविश्वास रखे, बहुलता का सम्मान करे, सत्ता से निर्भीक रहे और समाज के प्रति संवेदनशील हो।

पत्रकारिता को यह तय करना होगा कि उसका काम समाज को बदलना है या समाज को समझकर सत्ता से सवाल करना। यदि वह समाज से ऊपर खड़ी होकर सुधारक बनने की कोशिश करेगी, तो जनता उससे दूरी बनाएगी — और यह दूरी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होगी।

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