बिहार की राजनीति और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर गूंज उठा है। राज्यसभा में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने राजधानी पटना के नाम परिवर्तन को लेकर जोरदार मांग रख दी। उन्होंने सदन में भावनात्मक अंदाज में कहा कि जब “पाटलिपुत्र” नाम लिया जाता है तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, क्योंकि यह केवल एक शहर का नाम नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली इतिहास की पहचान है।
उनका यह बयान आते ही राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। नाम बदलने के सवाल पर जहां एक तरफ सांस्कृतिक विरासत का तर्क सामने आ रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक और व्यावहारिक चुनौतियों की चर्चा भी तेज हो गई है।
Pataliputra Name Change Demand in Rajya Sabha: कुशवाहा ने क्यों उठाई मांग?
सदन में अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि बिहार की राजधानी का वर्तमान नाम उसकी ऐतिहासिक गरिमा को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त नहीं करता। पाटलिपुत्र प्राचीन भारत की राजनीतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक राजधानी रहा है।

मौर्य और गुप्त साम्राज्य की राजधानी के रूप में इसकी पहचान विश्व स्तर पर रही। ऐसे में राजधानी का नाम पुनः पाटलिपुत्र किए जाने से न केवल ऐतिहासिक सम्मान लौटेगा बल्कि नई पीढ़ी भी अपने अतीत से मजबूत जुड़ाव महसूस करेगी।
उन्होंने यह भी आग्रह किया कि केंद्र सरकार इस दिशा में पहल करे और औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर राज्य की ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित करे।
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Historical Significance Behind Pataliputra Name Change Demand
प्राचीन पाटलिपुत्र आज के पटना का ही ऐतिहासिक स्वरूप माना जाता है। यह वही नगर है जहां से चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और बाद में गुप्त वंश ने शासन किया।
इतिहासकारों के अनुसार—
• पाटलिपुत्र विश्व के सबसे समृद्ध नगरों में गिना जाता था
• यहां से प्रशासनिक, सैन्य और सांस्कृतिक नीतियां संचालित होती थीं
• विदेशी यात्रियों ने भी इसकी समृद्धि का उल्लेख किया है
ऐसे गौरवशाली अतीत को देखते हुए नाम परिवर्तन की मांग भावनात्मक और सांस्कृतिक आधार पर जुड़ी मानी जा रही है।
Political Reactions on Pataliputra Name Change Demand
मांग सामने आते ही सियासी प्रतिक्रियाएं भी शुरू हो गई हैं। कुछ दल इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में सकारात्मक पहल बता रहे हैं, तो कुछ इसे प्रतीकात्मक राजनीति करार दे रहे हैं।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि नाम बदलने से ज्यादा जरूरी है राजधानी की आधारभूत संरचना, ट्रैफिक, जलजमाव और रोजगार जैसे मुद्दों पर ध्यान देना।
वहीं समर्थक पक्ष का तर्क है कि विकास और विरासत संरक्षण दोनों समानांतर चल सकते हैं।
Administrative & Legal Process for Capital Name Change
किसी भी शहर या राजधानी का नाम बदलना केवल राजनीतिक घोषणा भर नहीं होता, बल्कि लंबी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया से गुजरता है।
इसमें शामिल होते हैं—
• राज्य सरकार का प्रस्ताव
• विधानसभा की स्वीकृति
• केंद्र सरकार की मंजूरी
• गृह मंत्रालय की अधिसूचना
• मानचित्र, दस्तावेज, संस्थानों में संशोधन
इस प्रक्रिया में समय, संसाधन और व्यापक सहमति तीनों की आवश्यकता होती है।
Public Sentiment & Cultural Identity Debate
नाम परिवर्तन के मुद्दे पर जनभावनाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक वर्ग इसे गौरव वापसी मानता है, जबकि दूसरा इसे अनावश्यक खर्च बताता है।
पहले भी देश में कई शहरों के नाम बदले जा चुके हैं—जैसे इलाहाबाद से प्रयागराज, बंबई से मुंबई, मद्रास से चेन्नई। हर बार सांस्कृतिक पहचान बनाम प्रशासनिक लागत की बहस सामने आई।
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क्या बदलेगा नाम तो बदलेगी पहचान?
विशेषज्ञ मानते हैं कि नाम परिवर्तन प्रतीकात्मक शक्ति जरूर रखता है, लेकिन वास्तविक बदलाव शासन, विकास और नागरिक सुविधाओं से आता है।
यदि नाम परिवर्तन के साथ—
• विरासत संरक्षण
• पर्यटन विकास
• ऐतिहासिक शोध संस्थान
• सांस्कृतिक ब्रांडिंग
जुड़ जाए, तो इसका व्यापक प्रभाव दिख सकता है।
राज्यसभा में उठी यह मांग केवल नाम बदलने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान और राजनीति के त्रिकोण का नया विमर्श है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य और केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं। यदि प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह बिहार की राजधानी की पहचान से जुड़ा ऐतिहासिक निर्णय साबित हो सकता है।
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