लेखक-अनुभव सिन्हा
- State Assembly Election:तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा
- State Assembly Election: आगामी चुनाव वाम मोर्चे के लिए बनेगा प्रतिष्ठा का प्रश्न
- State Assembly Election: केरल से सामने आएगी नई राजनीतिक तस्वीर
- State Assembly Election: बंगाल में भ्रष्टाचार बनेगा बड़ा मुद्दा
- State Assembly Election:पांचों राज्यों में शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा
State Assembly Election: अप्रैल में प्रस्तावित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय स्तर पर होंगे लेकिन इनका महत्त्व राष्ट्रीय है और इसलिए राजनीति का तापमान बढ़ता जा रहा है। इन चुनावों को केवल क्षेत्रीय मुकाबला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उन राजनीतिक शक्तियों की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है जो लंबे समय से अपने-अपने राज्यों में सत्ता पर काबिज हैं। दिलचस्प बात यह है कि सभी राज्यों में एक साझा संकेत उभरता दिखाई दे रहा है। वह संकेत है सत्ता में बैठी ताकतों के सामने असामान्य दबाव और चुनौती। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इन पांचों राज्यों में कांग्रेस पार्टी की स्थिति बेहद खराब नजर आ रही है।
State Assembly Election:तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा
दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य Tamil Nadu में सत्तारूढ़ Dravida Munnetra Kazhagam (डीएमके) सरकार के खिलाफ विपक्ष ने एंटी-इंकम्बेंसी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया है। मुख्यमंत्री M. K. Stalin के नेतृत्व में सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं लागू की हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विपक्ष हमलावर है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि सत्ता में लगातार मजबूत स्थिति बनाए रखने वाली डीएमके इस बार संगठित चुनौती का सामना करते हुए लड़खड़ा रही है।

State Assembly Election: आगामी चुनाव वाम मोर्चे के लिए बनेगा प्रतिष्ठा का प्रश्न
इसी तरह Kerala में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा, जिसकी अगुवाई Communist Party of India (Marxist) कर रही है, लगातार दूसरे कार्यकाल में है। तीसरी बार सत्ता में आने का सपने पाल रही है। जबकि, केरल का चुनावी इतिहास सत्ता परिवर्तन का रहा है, लेकिन पिछली बार वाम मोर्चे ने परंपरा तोड़ी थी। आज वह इस मुगालते में है कि उसकी लकीर बड़ी है। इसलिए अब आर्थिक दबाव, वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक फैसलों को लेकर मिल रही विपक्ष की चुनौती से बौखला रही है। यह चुनाव वाम मोर्चे के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है।
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State Assembly Election: केरल से सामने आएगी नई राजनीतिक तस्वीर
असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित पुडुचेरी में चुनाव होने हैं। इन पांच राज्यों में ले-देकर असम और केरल में ही कांग्रेस की मौजूदगी नजर आती है। असम जहां कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर है वहीं केरल ही एक मात्र राज्य हो सकता है जहां वह पिनरई विजयन की सरकार को सत्ता से बेदखल कर सकती है। पर ऐसा होगा यह सवाल कांग्रेस के लिए दिवास्वप्न जैसा ही है। केरल कांग्रेस की आपसी खींचतान से कोई सकारात्मक संदेश निकल कर बहार नहीं आ रहा है। इन पांच राज्यों में से केरल ही एकमात्र राज्य है जहां से नयी राजनीतिक तस्वीर भी सामने आ सकती है।

State Assembly Election: बंगाल में भ्रष्टाचार बनेगा बड़ा मुद्दा
पूर्वी भारत में West Bengal की राजनीति भी केंद्र में है। All India Trinamool Congress (टीएमसी) चौथे कार्यकाल की ओर बढ़ रही है। राज्य में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों और संगठनात्मक चुनौतियों को विपक्ष ने प्रमुख मुद्दा बनाया है। टीएमसी का जमीनी नेटवर्क मजबूत माना जाता है, लेकिन विपक्षी लामबंदी ने मुकाबले को रोचक इसलिए भी बना दिया है क्योंकि एसआईआर के रूप में विपक्ष को ब्रह्मास्त्र मिल गया है जिसने टीएमसी के होश उड़ा दिए हैं।
उत्तर-पूर्व में Assam में Bharatiya Janata Party के नेतृत्व वाली सरकार को भी चुनावी परीक्षा से गुजरना है। विकास, पहचान और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे यहां केंद्र में हैं। विपक्ष राज्य सरकार पर वादों के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धियों को सामने रख रहा है।

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State Assembly Election:पांचों राज्यों में शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा
इन राज्यों के अलावा एक अन्य चुनावी राज्य में भी सत्तारूढ़ दल को स्थानीय मुद्दों और विपक्षी गठजोड़ की चुनौती का सामना है। समग्र रूप से देखें तो पांचों राज्यों में एक समान विशेषता उभरती दिख रही है—लंबे समय से सत्ता में बैठी ताकतों के खिलाफ संगठित राजनीतिक प्रतिरोध।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह चुनाव केवल सीटों का गणित नहीं है, बल्कि यह शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है। मतदाता अब केवल स्थायित्व या परंपरा के आधार पर मतदान नहीं कर रहे, बल्कि प्रदर्शन, पारदर्शिता और स्थानीय अपेक्षाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। यदि सत्तारूढ़ दल अपनी योजनाओं और संगठनात्मक मजबूती के बल पर जनादेश दोहराते हैं, तो यह उनके मॉडल की पुष्टि होगी। लेकिन यदि सीटों में उल्लेखनीय गिरावट आती है या त्रिशंकु स्थिति बनती है, तो इसे व्यापक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाएगा।
चुनावी प्रचार तेज होने के साथ ही गठबंधन समीकरण, उम्मीदवार चयन और स्थानीय मुद्दों की धार और स्पष्ट होगी। फिलहाल यह साफ है कि अप्रैल के ये चुनाव उन राजनीतिक शक्तियों के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं जो अब तक अपने-अपने राज्यों में “रूलिंग द रूस्ट” की स्थिति में रही हैं। परिणाम चाहे जो हों, लेकिन इन चुनावों का असर क्षेत्रीय राजनीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय परिदृश्य तक महसूस किया जाएगा।
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