स्वामी विवेकानंद को केवल एक संन्यासी या धर्मोपदेशक मानना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वे उस समय के विचारक थे जब भारत केवल राजनीतिक गुलामी में ही नहीं, बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक और आत्मिक पराधीनता में भी जकड़ा हुआ था। आत्मविश्वास टूटा हुआ था, समाज बिखरा हुआ था और राष्ट्र अपनी ही चेतना से दूर होता जा रहा था। ऐसे दौर में विवेकानंद ने जिस राष्ट्रबोध की कल्पना की, वह सत्ता या हिंसा से नहीं, बल्कि चेतना और करुणा से उपजा था।
उनके लिए राष्ट्र कोई सीमाओं में बंधी भौगोलिक इकाई नहीं था, बल्कि करोड़ों पीड़ित, भूखे और अपमानित लोगों की सामूहिक आत्मा था। इसलिए उनकी दृष्टि में राष्ट्रभक्ति का अर्थ नारा लगाना नहीं, बल्कि सेवा करना था।
Swami Vivekananda Nationalism: वेदांत आधारित राष्ट्रदृष्टि का मूल भाव
विवेकानंद की राष्ट्रचिंतन की जड़ें वेदांत में थीं। वेदांत का मूल संदेश है—सभी प्राणियों में एक ही चेतना का वास। यही विचार उनके राष्ट्रबोध की नींव बना। इसी कारण उनका चिंतन किसी एक धर्म, जाति या भाषा तक सीमित नहीं रहा।
उनके भारत-बोध में विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति थी। वे मानते थे कि अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ भारत की आत्मा के विभिन्न स्वर हैं। उनके विचार में समाज तभी मजबूत हो सकता है जब वह अपनी विविधता को स्वीकार करे और उसे सम्मान दे।
उनका प्रसिद्ध कथन कि मंदिरों से मूर्तियाँ हटाकर करोड़ों भूखे-नंगे लोगों को प्रतिष्ठित किया जाए, इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए करुणा और मानवीय गरिमा सबसे ऊपर थी। वे भली-भांति जानते थे कि खाली पेट देशभक्ति नहीं पनपती।
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Swami Vivekananda Nationalism: सेवा, करुणा और सामाजिक न्याय का राष्ट्रवाद

विवेकानंद का राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं था। वह किसी को नीचा दिखाकर श्रेष्ठ बनने की प्रेरणा नहीं देता था, बल्कि स्वयं को सशक्त बनाकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता था। उनके विचार में मजबूत राष्ट्र की नींव नैतिक, आत्मविश्वासी और करुणाशील नागरिक होते हैं।
वे सामाजिक न्याय, शिक्षा और आत्मसम्मान को राष्ट्रनिर्माण की पहली शर्त मानते थे। उनका प्रसिद्ध कथन—“पहले रोटी, फिर धर्म”—आज भी समाज को आईना दिखाता है। उनका धर्म पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, बल्कि सेवा और समानता में बसता था।
इस कारण उनका राष्ट्रवाद किसी धर्मविशेष का विस्तार नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना का प्रयास था।
Swami Vivekananda Nationalism: विविधता में एकता का भारत-बोध
विवेकानंद के विचारों में भारत किसी एक पहचान में सिमटने वाला राष्ट्र नहीं था। वह विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं और विश्वासों को जोड़ने वाला जीवंत समाज था। वे जातिवाद, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के प्रखर आलोचक थे।
मुंशी फैज अली के साथ उनका संवाद इस दृष्टि को अत्यंत सुंदर रूप में सामने लाता है, जहाँ वे फूलों की उपमा देकर समझाते हैं कि केवल एक ही प्रकार के फूलों से संसार नीरस हो जाएगा। विविधता ही सौंदर्य की आत्मा है। यह विचार केवल धार्मिक सहिष्णुता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की घोषणा है।
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Swami Vivekananda Nationalism: युवाओं और चरित्र निर्माण की भूमिका
विवेकानंद का राष्ट्रवाद युवाओं के बिना अधूरा है। उनका प्रसिद्ध आह्वान—“उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको”—केवल व्यक्तिगत सफलता का मंत्र नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक उत्थान का संदेश है।
वे चरित्र-निर्माण को राष्ट्र-निर्माण की पहली शर्त मानते थे। साहस, करुणा और आत्मविश्वास—ये गुण उनके अनुसार सशक्त राष्ट्र की पहचान हैं। उनका वेदांत पलायन नहीं सिखाता, बल्कि कर्मयोग का मार्ग दिखाता है, जहाँ सेवा ही साधना बन जाती है।
Swami Vivekananda Nationalism: आधुनिक दौर में विवेकानंद की प्रासंगिकता
आज जब राष्ट्रवाद कई बार विभाजन और बहिष्कार का माध्यम बनता दिखता है, विवेकानंद का चिंतन और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनका राष्ट्रवाद नफरत नहीं, संवाद सिखाता है। वह दीवारें नहीं, सेतु बनाता है।
उनका भारत-बोध यह याद दिलाता है कि बिना सामाजिक न्याय के राष्ट्रवाद खोखला है। उनके लिए राष्ट्र कोई नारा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी था—ऐसी जिम्मेदारी जो पहले मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, फिर नागरिक बनाती है।
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