होली के बाद बिहार की राजनीति में ऐसा सियासी मोड़ आया जिसने पूरे राज्य को चौंका दिया। करीब दो दशकों से बिहार की सत्ता की धुरी रहे Nitish Kumar ने अचानक राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया।
- Nitish Kumar Rajya Sabha: अचानक फैसले से क्यों मचा सियासी तूफान
- Bihar Politics: जेडीयू कार्यकर्ताओं में फूटा गुस्सा
- Bihar Politics: पार्टी नेताओं में भी असहमति
- Bihar Politics: विपक्ष की उम्मीदों पर भी लगा विराम
- Bihar Politics: भाजपा के लिए खुला नया राजनीतिक मौका
- Nitish Kumar Decision: सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी
यह फैसला सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं था, बल्कि ऐसा कदम था जिसने सत्ता, गठबंधन और भविष्य की राजनीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। लंबे समय से समाजवादी राजनीति से जुड़े नीतीश कुमार को हमेशा अप्रत्याशित फैसलों के लिए जाना जाता रहा है। कभी अपने धुर विरोधी Lalu Prasad Yadav के साथ महागठबंधन बनाना हो या फिर Bharatiya Janata Party के साथ मिलकर सरकार चलाना — उन्होंने बार-बार सियासी समीकरण बदलकर सबको चौंकाया है।
Nitish Kumar Rajya Sabha: अचानक फैसले से क्यों मचा सियासी तूफान
हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को भारी बहुमत मिला था। 243 सदस्यीय विधानसभा में गठबंधन को 202 सीटें मिलीं और नीतीश कुमार ने 20 नवंबर को दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन होली के दूसरे दिन मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर एक संदेश पोस्ट कर सभी को चौंका दिया। उन्होंने लिखा कि दो दशकों से अधिक समय से जनता ने उन पर विश्वास किया है और संसदीय जीवन की शुरुआत से ही उनकी इच्छा रही है कि वे संसद के दोनों सदनों के सदस्य बनें। इसी क्रम में उन्होंने राज्यसभा जाने की इच्छा जाहिर की।
इस घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah की मौजूदगी में राज्यसभा के लिए नामांकन भी दाखिल कर दिया।
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Bihar Politics: जेडीयू कार्यकर्ताओं में फूटा गुस्सा
मुख्यमंत्री के इस फैसले के बाद Janata Dal (United) के कार्यकर्ताओं में नाराजगी की लहर दौड़ गई।
राज्यभर में विरोध प्रदर्शन होने लगे और कई कार्यकर्ताओं ने इसे जनादेश का अपमान बताया। उनका कहना था कि बिहार की जनता ने विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व पर भरोसा करके वोट दिया था। ऐसे में अचानक राज्यसभा जाने का फैसला मतदाताओं की भावनाओं के खिलाफ है।
पटना स्थित जेडीयू कार्यालय में नाराज कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ भी की और मुख्यमंत्री से अपना फैसला वापस लेने की मांग की।
JDU Politics Bihar: पोस्टरों और नारों से जताया विरोध

नाराज कार्यकर्ताओं ने पार्टी कार्यालय के बाहर पोस्टर लगाकर फैसले पर पुनर्विचार की मांग की।
कुछ जगहों पर भाजपा और जेडीयू के संयुक्त पोस्टरों पर प्रधानमंत्री Narendra Modi की तस्वीर पर कालिख पोतकर विरोध जताया गया।
यह विरोध सिर्फ सड़कों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि पार्टी के अंदर भी कई नेता इस फैसले से असहमत दिखाई दिए।
Bihar Politics: पार्टी नेताओं में भी असहमति
जेडीयू के कई नेता और विधायक भी इस फैसले को लेकर असमंजस में हैं।
पार्टी के वरिष्ठ नेता Shyam Rajak और Vijay Kumar Chaudhary समेत कई नेताओं ने खुले तौर पर सवाल उठाए हैं कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री को यह फैसला लेना पड़ा।
विधायक Anil Chaudhary ने कहा कि सिर्फ साढ़े तीन महीने के भीतर ऐसी कौन-सी परिस्थिति बन गई कि मुख्यमंत्री को पद छोड़ने का फैसला करना पड़ा।
Bihar Politics: विपक्ष की उम्मीदों पर भी लगा विराम
मुख्यमंत्री के इस कदम से विपक्ष की राजनीति भी प्रभावित हुई है।
विपक्ष लंबे समय से उम्मीद लगाए बैठा था कि कभी न कभी नीतीश कुमार भाजपा से अलग होकर फिर से महागठबंधन के साथ आ सकते हैं।
लेकिन इस फैसले ने उन संभावनाओं पर लगभग विराम लगा दिया। पिछले विधानसभा चुनाव में भी महागठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी और Tejashwi Yadav की पार्टी Rashtriya Janata Dal को सीमित सीटें ही मिल पाई थीं।
Bihar Politics: भाजपा के लिए खुला नया राजनीतिक मौका
नीतीश कुमार के इस कदम से भाजपा को बिहार की राजनीति में बड़ा अवसर मिल सकता है।
पिछले दो दशकों से भाजपा गठबंधन की राजनीति के तहत सरकार में साझेदार रही है, लेकिन मुख्यमंत्री पद जेडीयू के पास ही रहा।
अब पहली बार ऐसा मौका बन सकता है जब भाजपा को बिहार में पूरी तरह नेतृत्व करने का अवसर मिले। इससे राज्य की राजनीतिक दिशा भी बदल सकती है।
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Nitish Kumar Decision: सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी
नीतीश कुमार के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या कारण रहा जिसने उन्हें अचानक यह कदम उठाने पर मजबूर किया।
वह चाहते तो देश में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी बना सकते थे। अभी यह रिकॉर्ड Pawan Kumar Chamling के नाम है, जिन्होंने 24 वर्ष से अधिक समय तक मुख्यमंत्री पद संभाला।
लेकिन नीतीश कुमार ने उस दिशा में आगे बढ़ने के बजाय राज्यसभा की राह चुनी।
अब यह फैसला बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा, इसका जवाब आने वाले समय में ही मिलेगा।
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