UGC Equal Opportunity Rules Controversy: समानता के नए नियमों ने देशभर में सियासी तेवर बढ़ाए
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिये जारी किए गए नए नियमों ने देश में राजनीति की हलचल को तेज कर दिया है। नियमों के अभी लागू होते ही सवर्ण समुदाय और कुछ अन्य समूहों में नाराजगी की आवाज़ें सामने आने लगी हैं। सोशल मीडिया और सड़कों पर यह दावा किया जा रहा है कि यह नया रेगुलेशन एक विशेष वर्ग को निशाना बनाने के लिये लाया गया है और इसका दुरुपयोग छात्रों तथा शिक्षकों को प्रताड़ित करने के लिये किया जा सकता है।
- UGC Equal Opportunity Rules Controversy: समानता के नए नियमों ने देशभर में सियासी तेवर बढ़ाए
- UGC Equal Opportunity Rules Controversy: नए नियमों का उद्देश्य और प्रमुख प्रावधान
- UGC Equal Opportunity Rules Controversy: नियमों की पृष्ठभूमि में न्यायपालिका की भूमिका
- UGC Equal Opportunity Rules Controversy: नियमों में शामिल मुख्य व्यवस्थाएं
- UGC Equal Opportunity Rules Controversy: विरोध और समर्थन के तर्क
- UGC Equal Opportunity Rules Controversy: असमानता से उबरने की दिशा में एक अवसर?
संसद से लेकर सामाजिक मंचों तक, नए नियमों के बारे में उलझनें और आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। ऐसे में जरूरी है कि भावनात्मक शोर से अलग हटकर इन नियमों की वास्तविकता को समझा जाये: क्या ये सच में किसी समुदाय के खिलाफ हैं, या फिर यह उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे समय से चली आ रही असमानता और भेदभाव की समस्या को दूर करने का एक प्रयास मात्र हैं?
UGC Equal Opportunity Rules Controversy: नए नियमों का उद्देश्य और प्रमुख प्रावधान
केंद्र सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026) को अधिसूचित कर दिया है। यह नया ढांचा देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों पर लागू होगा। इसके मुख्य उद्देश्यों में शामिल हैं:
• भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के निवारण के लिये एक स्पष्ट और सक्रिय व्यवस्था।
• वंचित सामाजिक समूहों को संस्थागत सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करना।
• समान अवसर केंद्र की स्थापना, जो न केवल शिकायतें सुने बल्कि शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक सहायता भी उपलब्ध कराये।
प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को अब एक समान अवसर केंद्र स्थापित करना अनिवार्य होगा। यह केंद्र परिसर में भेदभाव के मामलों को देखने, समाधान सुझाने और आवश्यक सहारा प्रदान करने का काम करेगा। यदि किसी संस्थान में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, तो यह कार्य संबंधित विश्वविद्यालय के समान अवसर केंद्र के मार्फत किया जायेगा।
यह भी पढ़े : https://livebihar.com/cable-news-culture-crisis/
UGC Equal Opportunity Rules Controversy: नियमों की पृष्ठभूमि में न्यायपालिका की भूमिका

इन नियमों की अधिसूचना के पीछे न्यायपालिका की भी एक बड़ी भूमिका है। वर्ष 2012 में बने भेदभाव-विरोधी प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी को अद्यतन नियम प्रस्तुत करने के निर्देश दिये थे।
यह याचिका रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने अपने बच्चों की कथित उत्पीड़न एवं भेदभाव के मामलों में न्याय की मांग की थी। इन दोनों मामलों ने देशभर में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न, भेदभाव और संस्थागत उदासीनता का मुद्दा उभारा था, जिसकी व्यापक सामाजिक-राजनीतिक बहस हुई थी।
UGC Equal Opportunity Rules Controversy: नियमों में शामिल मुख्य व्यवस्थाएं
नए नियमों के तहत स्थापित किए जाने वाले क़दमों में प्रमुख हैं —
- समानता समिति का गठन
प्रत्येक संस्थान में एक समानता समिति का गठन करना अनिवार्य किया गया है। इस समिति में निम्नलिखित वर्गों का प्रतिनिधित्व अपेक्षित है:
• अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति
• अन्य पिछड़ा वर्ग
• महिलाएँ
• दिव्यांग व्यक्ति
इस समिति का कार्यकाल दो वर्ष का होगा, और उसे प्रत्येक छह महीने में अपनी रिपोर्ट संस्थान तथा यूजीसी को भेजनी होगी।
- समानता दस्तों का गठन
भेदभाव की रोकथाम के लिये समानता दस्तों का गठन भी अनिवार्य किया गया है। ये छोटे सतर्कता इकाइयाँ संस्थानों में त्वरित प्रतिक्रिया और सहायता के लिये कार्य करेंगी।
- कानूनी सहायता एवं समन्वय प्रावधान
नियम यह भी निर्देश देते हैं कि समान अवसर केंद्र स्थानीय प्रशासन, पुलिस, गैर-सरकारी संगठनों, नागरिक समूहों और विधिक सेवा प्राधिकरणों के साथ समन्वय करेगा, ताकि आवश्यकता पड़ने पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
- समन्वयक नियुक्ति और दंडात्मक अधिकार
प्रत्येक संस्थान में एक वरिष्ठ शिक्षक को समान अवसर केंद्र का समन्वयक नियुक्त किया जाएगा, जो वंचित समूहों के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध माना जाता हो।
अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो यूजीसी के पास कड़ी कार्रवाई के अधिकार होंगे —
जैसे कि
• यूजीसी योजनाओं से वंचित करना
• डिग्री/दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों को रोकना
• संस्थान को मान्यता सूची से हटाना
UGC Equal Opportunity Rules Controversy: विरोध और समर्थन के तर्क
नियमों के लागू होते ही देश के कुछ हिस्सों में इनके खिलाफ आवाज़ें उठने लगी हैं। विरोध करने वाले तर्क देते हैं कि नियमों का दुरुपयोग हो सकता है, और यह किसी विशेष समुदाय के खिलाफ लक्षित हैं।
वहीं समर्थक यह कहते हैं कि यह नियम लंबे समय से चली आ रही असमानताओं को दूर करने के लिये आवश्यक हैं।
जहाँ आंकड़े बताते हैं कि बीते वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में निरंतर वृद्धि हुई है, वहीं यह भी साफ़ है कि मौजूदा व्यवस्थाएं इस समस्या का समाधान करने में अपर्याप्त थीं।
Do Follow us : https://www.facebook.com/share/1CWTaAHLaw/?mibextid=wwXIfr
UGC Equal Opportunity Rules Controversy: असमानता से उबरने की दिशा में एक अवसर?
उच्च शिक्षण संस्थान किसी भी समाज की वैचारिक प्रयोगशाला होते हैं। अगर वही स्थान असमानता और भय के केंद्र बन जाएँ, तो यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत नहीं।
ये नए नियम किसी एक वर्ग के खिलाफ़, बल्कि पूरे शैक्षणिक तंत्र को अधिक मानवीय, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण बनाने की कोशिश हैं। इस प्रयास को लेकर जतायी जा रही आशंकाओं को संवाद, पारदर्शिता और जागरूकता से कम किया जा सकता है।
यह सच है कि हर नियम को दुरुपयोग की गुंजाइश होती है, लेकिन केवल इसी भय की वजह से सुधार को रोक देना समाधान नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि संस्थान इन नियमों को कागज़ी रूप से न रखें, बल्कि उसे ईमानदारी से लागू करें।
यदि ये नियम सही भावना के साथ जमीन पर उतरते हैं तो —
✔ वंचित छात्रों और शिक्षकों में भरोसा पैदा होगा
✔ उच्च शिक्षा की गुणवत्ता एवं समावेशन में सुधार होगा
✔ संस्थागत भेदभाव और असमानता को कम करने में मदद मिलेगी
Do Follow us : https://www.youtube.com/results?search_query=livebihar

