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नए श्रम कानून का क्यों हो रहा है विरोध, सड़क पर क्यों हैं ट्रेड यूनियन वाले

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केंद्रीय ट्रेड यूनियन ने मजदूरों को अधिकार दिलाने के लिए आज ‘भारत बंद’ के ऐलान की घोषणा की है. इस बंद का वाम दलों और आरजेडी ने समर्थन किया है. इसका असर दिखने लगा है.देश सहित पटना में भी प्रदर्शन जोरो पर है। वहीं विपक्षी पार्टियों को भी इस बंद का समर्थन मिल रहा है। लेकिन आखिर यह प्रदर्शन हो क्यो रहे हैं? यह सवाल भी आपके मन में होगा, ऐसे में इसके बारे में जानना बेहद जरूरी है कि

दरअसल, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर राष्ट्रव्यापी हड़ताल किया गया है. मजदूर संघ को छोड़कर 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने देशव्यापी आम हड़ताल किया है। इनमें ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), हिंद मजदूर सभा (एचएमएस), सेंटर फार इंडियान ट्रेड यूनियंस (सीटू), ऑल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (एआईयूटीयूसी), ट्रेड यूनियन को-ऑर्डिनेशन सेंटर (टीयूसीसी), सेल्फ-एम्प्लॉइड वुमेन्स एसोसिएशन (सेवा), ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (एआईसीसीटीयू), लेबर प्रोग्रेसिव फेडरेशन (एलपीएफ) और यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटीयूसी) के संयुक्त फोरम शामिल हैं। अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ भी इसमें शामिल है।

नए श्रम कानून संशोधन 2020 में काम करने के घंटों को 8 की जगह 12 घंटे कर दिया गया है लेकिन यहां सरकार ने कहा है कि 12 घंटे का काम वर्कर अपनी इच्छा से कर सकता है इसके अलावा इस कानून में अनुबंध के साथ नौकरी पर रखने वाले लोगों को हटाने, काम के दौरान हादसे का शिकार होने और समय पर पगार देने जैसे नियमों को भी जोड़ा गया है।

सरकार का तर्क है कि इस कानून के जरिए लॉकडाउन के बाद कामकाज में तेजी आएगी। देश में आर्थिक गतिविधियों को जोर मिलेगा और विदेशी कंपनियों को लुभाने का मौका मिलेगा। साथ ही लॉकडाउन के कारण कामकाज जिस तरह से ठप्प हो गया था उसे दोबारा तेजी के साथ करने में बल मिलेगा और इस व्यवस्था से अब श्रमिकों के हकों की रक्षा हो सकेगी।

लेकिन श्रमिक यूनियनों को विधेयक के कई बातों से आपत्ति है। सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के संबंध में श्रमिक युनियनों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह सामाजिक सुरक्षा को एक अधिकार के तौर पर महत्व नहीं देता है। संहिता की धारा 2 (6), 10 और उससे अधिक भवन व अन्य निर्माण श्रमिकों की पुरानी सीमा को बरकरार रखती है। इस विधेयक में “व्यक्तिगत आवासीय निर्माण कार्य” जो दैनिक मजदूरी के तौर पर बड़े स्तर पर लोगों को काम देता है, को संहिता के प्रावधानों से बाहर रखा गया है। इसके साथ ही भविष्य निधि के लिए केवल उन प्रतिष्ठानों को ही मान्य किया गया है, जहां 20 या अधिक कर्मचारी हों, जबकि लाखों सूक्ष्म और लघु उद्यमों को इसके दायरे से बाहर कर दिया गया है।

श्रमिक यूनियनों की यह भी मांग है कि अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिकों (विभिन्न राज्यों में काम के लिए जाने वाले श्रमिक) का अलग-अलग वर्गीकरण किया जाए। इसके साथ ही उनके कल्याणकारी कोष में योगदान के लिए एक उचित प्रणाली की व्यवस्था की जाए, जिसमें काम करने वाली इस अस्थायी आबादी के लिए सामाजिक सुरक्षा शामिल हो। श्रमिक कार्यकर्ता यह भी आरोप लगाते हैं कि लोकसभा में पेश किए गए तीनों विधेयक इंट्रा-स्टेट माइग्रेंट वर्कर्स (यानी उसी राज्य के भीतर चल रहे पलायन) पर चुप हैं, जो देश में प्रवासी श्रमिकों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है।

इस नए कानून को लेकर खेतिहर मजदूर की व्यावसायिक सुरक्षा की भी चिंता सता रही है। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल स्थिति विधेयक 2020 व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियों को विनियमित करने वाले कानूनों को समेकित और संशोधित करने का प्रयास करता है। हालांकि वर्किंग पीपुल्स चार्टर के हालिया बयान में कहा गया है, ” यह विधेयक आर्थिक गतिविधियों की कई शाखाओं को छोड़ देता है, विशेष रूप से कृषि क्षेत्र जो भारत की कुल कार्यशील आबादी के 50% से अधिक हिस्से को रोजगार देता है।” संस्था का आरोप है कि यह विधेयक असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के एक बड़े हिस्से को छोड़ देता है।

जैसे कि छोटी खदानें, होटल और छोटे भोजनालय, मशीनों की मरम्मत, निर्माण, ईंट-भट्टे, हथकरघे, कालीन या कारपेट निर्माण और ऐसे श्रमिक या कर्मचारी जो संगठित क्षेत्रों में अनौपचारिक तौर पर काम कर रहे हैं, जिसमें नए और उभरते क्षेत्रों जैसे आईटी और आईटीईएस, डिजिटल प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स समेत कई क्षेत्र शामिल हैं। श्रमिक यूनियनों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का स्वागत किया है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने दैनिक श्रमिकों और खेत मजदूरों सहित सभी श्रमिकों के लिए व्यावसायिक सुरक्षा और कार्यस्थल में बेहतर माहौल की भी मांग की है।

इस विधेयक से जुड़ा एक अन्य विवादास्पद मुद्दा यह है कि यह ठेकेदारों पर श्रमिकों की सुरक्षा का दबाव डालता है न कि प्रमुख नियोक्ताओं या मालिकों पर। “सुरक्षा और स्वास्थ्य के संबंध में नियोक्ताओं पर कोई जिम्मेदारी तय नहीं करने की वजह से यह विधेयक मजदूरों के हित में नहीं हैं इसके साथ ही यह दैनिक और साप्ताहिक कार्य घंटों के लिए भी न्यूनतम मानक तय नहीं करता है।

श्रमिक यूनियनों का दावा है कि औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक 2020 ‘मजदूर’ की परिभाषा को सीमित भी करता है। इसमें लाखों नए और मौजूदा श्रेणियों को वैधानिक औद्योगिक संबंध संरक्षण के दायरे से बाहर छोड़ दिया जाएगा, जिसमें प्लेटफॉर्म श्रमिक, प्रशिक्षु, आईटी श्रमिक, स्टार्टअप्स और लघु, कुटीर एवं मध्यम उपक्रम में कार्यरत, स्व-नियोजित श्रमिक, घर-आधारित श्रमिक, असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक, वृक्षारोपण श्रमिक व मनरेगा श्रमिक शामिल हैं।

इसके साथ ही दूसरी ओर, हड़ताल की परिभाषा के तहत किसी उद्योग में कार्यरत पचास प्रतिशत या उससे अधिक श्रमिकों द्वारा एक निश्चित दिन पर आकस्मिक अवकाश को शामिल किया गया है। यह श्रमिकों की प्रदर्शनों में भाग लेने की क्षमता को बाधित करता है।

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