Shambhu Girls Hostel Case में तीन पुलिस अफसर निलंबित, बिहार पुलिस की जांच पर सवाल
पटना की फिज़ाओं में एक बार फिर इंसाफ़ की चीख़ गूंज रही है। मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही एक छात्रा के साथ कथित ज्यादती और फिर उसकी रहस्यमयी मौत के मामले ने न सिर्फ़ सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि बिहार पुलिस की शुरुआती भूमिका पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस पूरे प्रकरण में पुलिस महकमे को अपनी ही कतार में झांकना पड़ा है।
- Shambhu Girls Hostel Case में तीन पुलिस अफसर निलंबित, बिहार पुलिस की जांच पर सवाल
- Shambhu Girls Hostel Case में जांच की गंभीर चूक, सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप
- Shambhu Girls Hostel Case: मीडिया, छात्रों और परिवार के दबाव में पुलिस मुख्यालय हरकत में
- Shambhu Girls Hostel Case: क्या निलंबन से मिलेगा इंसाफ़ या अभी बाकी है बड़ी कार्रवाई?
चित्रगुप्तनगर थाना कांड संख्या 14/26 में गंभीर पुलिसिया कोताही सामने आने के बाद कदमकुआं के अपर थानाध्यक्ष, अवर निरीक्षक हेमंत झा और चित्रगुप्तनगर की थानाध्यक्ष अवर निरीक्षक रोशनी कुमारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। यह कार्रवाई उस समय हुई है जब इस मामले में लगातार जांच की दिशा, सुस्ती और संभावित लीपापोती पर सवाल उठ रहे थे।
Shambhu Girls Hostel Case: पोस्टमार्टम और एफएसएल रिपोर्ट के बाद पलटी पुलिस की कहानी
शुरुआत में जिस तरह से पूरे घटनाक्रम को संदिग्ध हालात में हुई आत्महत्या के तौर पर पेश किया गया, उसने पीड़ित परिवार को ही नहीं बल्कि आम लोगों को भी असहज कर दिया। नींद की गोलियों के आधार पर जल्दबाज़ी में गढ़ी गई थ्योरी को 12 जनवरी को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सामने रखा गया और रिपोर्ट आने तक उसी लाइन को दोहराया जाता रहा।
लेकिन जैसे-जैसे पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स सामने आईं, शुरुआती दावों की नींव हिलने लगी। शरीर पर मिले चोट के निशानों ने उस कहानी पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया, जिसे पहले “सुसाइड एंगल” बताकर मामले को लगभग बंद करने की कोशिश की जा रही थी।
यहीं से पुलिस की भूमिका पर शक गहराता चला गया।
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Shambhu Girls Hostel Case में जांच की गंभीर चूक, सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप
जांच की साख तब और कमजोर हो गई जब सामने आया कि घटना स्थल को समय पर सील नहीं किया गया। आरोप हैं कि लगभग 72 घंटे तक कार्रवाई में ढिलाई बरती गई। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि सीसीटीवी डीवीआर को थाने की आधिकारिक प्रक्रिया के बजाय निजी ड्राइवर के ज़रिए मंगवाया गया।
ऐसे कदम किसी भी आपराधिक जांच में सबूतों को दूषित करने की श्रेणी में आते हैं। यही नहीं, जिन अधिकारियों को जांच से अलग रखने के निर्देश दिए गए थे, वे कथित तौर पर एसआईटी टीम के साथ मौके पर देखे गए। यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है कि यह महज़ आदेशों की अवहेलना थी या किसी बड़े दबाव का नतीजा।
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Shambhu Girls Hostel Case: मीडिया, छात्रों और परिवार के दबाव में पुलिस मुख्यालय हरकत में

चित्रगुप्तनगर थाना कांड संख्या 14/26 के तहत चल रहे अनुसंधान में एक अहम फॉरेंसिक साक्ष्य सामने आया है। मृतका के परिजनों द्वारा 10 जनवरी 2026 को पुलिस को सौंपे गए कुछ वस्त्रों को विधि-सम्मत प्रक्रिया के तहत जब्त कर फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) भेजा गया था। एफएसएल जांच के दौरान कथित रूप से घटना के समय पहने गए पीड़िता के Undergarments से Male Sperm के अवशेष पाए गए हैं। इस साक्ष्य के आधार पर एफएसएल द्वारा डीएनए प्रोफाइल तैयार की जा रही है। पुलिस के अनुसार, आगे की जांच में इस डीएनए प्रोफाइल का मिलान गिरफ्तार अभियुक्त के साथ-साथ एसआईटी द्वारा चिन्हित अन्य संदिग्ध व्यक्तियों के डीएनए से किया जाएगा, ताकि घटना से जुड़े तथ्यों की वैज्ञानिक पुष्टि हो सके।
लगातार मीडिया रिपोर्ट्स, छात्रों के प्रदर्शन और पीड़ित परिवार के सवालों ने आखिरकार पुलिस मुख्यालय को कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। एसएसपी कार्यालय के अनुसार, निलंबित किए गए अफसरों पर आरोप है कि सूचना मिलने के बावजूद समय पर आसूचना संकलन नहीं किया गया, न ही परिस्थितियों के अनुरूप सख़्त कार्रवाई की गई।
इस लापरवाही का सीधा असर तफ्तीश पर पड़ा और शुरुआती दौर में सच्चाई पर पर्दा पड़ गया। अब तीन अधिकारियों पर गिरी गाज को महज़ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि सिस्टम के भीतर बढ़ते दबाव की स्वीकारोक्ति के तौर पर देखा जा रहा है।
Shambhu Girls Hostel Case: क्या निलंबन से मिलेगा इंसाफ़ या अभी बाकी है बड़ी कार्रवाई?
तीन अधिकारियों का निलंबन इस पूरे मामले में एक अहम मोड़ ज़रूर है, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं। क्या यह सिर्फ़ लापरवाही थी या फिर मिलीभगत? क्या शुरुआती जांच की दिशा जानबूझकर भटकाई गई? और सबसे अहम — क्या पीड़ित छात्रा को इंसाफ़ मिल पाएगा?
परिवार का दर्द, छात्रों का गुस्सा और समाज की उम्मीदें अब इस बात पर टिकी हैं कि आगे की जांच कितनी पारदर्शी होती है। यह मामला अब केवल एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
इंसाफ़ की राह पर अभी कई साये बाकी हैं — और हर साया एक नए सवाल को जन्म दे रहा है।
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